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केरल विधानसभा ने एफसीआरए संशोधनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया, 111 वोटों से मंजूरी

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केरल विधानसभा ने एफसीआरए संशोधनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया, 111 वोटों से मंजूरी

सारांश

केरल विधानसभा ने 111-2 के बहुमत से केंद्र सरकार के एफसीआरए संशोधनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। मुख्यमंत्री वीडी सतीशन का आरोप है कि ये बदलाव एनजीओ की स्वायत्तता छीनते हैं। BJP ने इसे संघीय व्यवस्था के विरुद्ध बताया।

मुख्य बातें

केरल विधानसभा ने 1 जुलाई 2026 को 111-2 मतों से एफसीआरए संशोधनों के खिलाफ विशेष प्रस्ताव पारित किया।
प्रस्ताव में केंद्र से विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 को पूरी तरह वापस लेने की माँग की गई।
नए नियमों के तहत संस्थाओं की गतिविधियाँ 105 निर्धारित क्षेत्रों तक सीमित और तकनीकी चूक पर 30% तक जुर्माने का प्रावधान।
मुरलीधरन ने प्रस्ताव को संघीय व्यवस्था के विरुद्ध बताया; उनके संशोधन प्रस्ताव खारिज हुए।
मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने आरोप लगाया कि संशोधनों का उद्देश्य एनजीओ को केंद्रीय नियंत्रण में लाना है।

केरल विधानसभा ने 1 जुलाई 2026 को 111 मतों के भारी बहुमत से एक विशेष प्रस्ताव पारित किया, जिसमें केंद्र सरकार से विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) और विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 में प्रस्तावित बदलावों को पूरी तरह वापस लेने की माँग की गई। केवल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के दो विधायकों ने इसके विरुद्ध मतदान किया।

प्रस्ताव का विवरण और मतदान

यह प्रस्ताव 111 मतों के समर्थन और 2 मतों के विरोध से पारित हुआ। BJP विधायकों द्वारा पेश किए गए संशोधन प्रस्ताव मतदान से पहले ही खारिज कर दिए गए थे। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र और कई राज्य सरकारों के बीच नागरिक समाज संस्थाओं के विनियमन को लेकर तनाव बढ़ रहा है।

मुख्यमंत्री का आरोप

प्रस्ताव पेश करते हुए मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने आरोप लगाया कि केंद्र के प्रस्तावित संशोधनों का वास्तविक उद्देश्य स्वयंसेवी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को केंद्रीय नियंत्रण में लाना है, जिससे उनकी स्वायत्तता प्रभावित होगी। उनके अनुसार, ये संस्थाएँ केरल में जनकल्याण, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, दिव्यांगों के पुनर्वास, आपदा राहत और अन्य मानवीय कार्यों में सरकार के साथ मिलकर काम करती हैं।

प्रस्तावित संशोधनों पर आपत्तियाँ

विधानसभा ने कई प्रावधानों पर गंभीर चिंता जताई। नए नियमों के तहत संस्थाओं की गतिविधियाँ केवल 105 निर्धारित क्षेत्रों तक सीमित कर दी गई हैं। पंजीकरण वाले राज्य के बाहर कार्य करने के लिए अलग पंजीकरण अनिवार्य होगा। विदेशी फंड की अगली किस्त तभी मिलेगी जब पिछले फंड के उपयोग की जाँच पूरी हो, जिससे परियोजनाओं में विलंब हो सकता है। इसके अतिरिक्त, छोटी तकनीकी चूक पर भी विदेशी फंड का 30 प्रतिशत तक जुर्माना लगाया जा सकता है।

प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि पदाधिकारियों के व्यक्तिगत सोशल मीडिया खातों और प्रकाशित लेखों की जानकारी देना अनिवार्य करना उनकी निजता का उल्लंघन है और संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध है। साथ ही, 'मुख्य पदाधिकारी' की परिभाषा में ट्रस्टी, साझेदार और निदेशकों को शामिल कर उन्हें व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी बनाने से प्रतिष्ठित लोग सामाजिक संस्थाओं से जुड़ने से कतराएँगे, ऐसी आशंका विधानसभा ने जताई।

विधानसभा ने उस प्रावधान पर भी आपत्ति दर्ज की जिसके तहत एफसीआरए पंजीकरण रद्द, निलंबित या नवीनीकृत न होने की स्थिति में सरकार द्वारा नामित अधिकारी उस संस्था की विदेशी फंड से निर्मित संपत्तियों का नियंत्रण लेकर उन्हें बेच भी सकता है। 'धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करना' पद की अस्पष्ट परिभाषा को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई, जिसका दुरुपयोग आदिवासी और अन्य कमजोर वर्गों के बीच काम करने वाले संगठनों के विरुद्ध हो सकता है।

BJP का विरोध और संघीय तर्क

BJP विधायक वी. मुरलीधरन ने तर्क दिया कि राज्य विधानसभा को संसद द्वारा पारित कानूनों में बदलाव की माँग करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है और ऐसा प्रस्ताव संघीय व्यवस्था के सिद्धांतों के विरुद्ध है। हालाँकि, विधानसभा ने उनके संशोधन प्रस्तावों को अस्वीकार कर मूल प्रस्ताव को भारी बहुमत से पारित कर दिया।

आगे क्या

विधानसभा ने केंद्र सरकार से प्रस्तावित सभी संशोधनों को पूरी तरह वापस लेने की औपचारिक अपील की है। यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह केंद्र-राज्य संबंधों में एफसीआरए के मुद्दे को राजनीतिक रूप से और अधिक उभार सकता है। आने वाले दिनों में अन्य विपक्षी-शासित राज्यों की प्रतिक्रिया भी महत्त्वपूर्ण होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक बड़े केंद्र-राज्य टकराव की आहट है — खासकर तब जब एफसीआरए का उपयोग पहले भी विवादास्पद रहा है और कई संस्थाओं के पंजीकरण रद्द हो चुके हैं। '105 निर्धारित क्षेत्रों' की सीमा और 30% जुर्माने का प्रावधान नागरिक समाज के लिए असाधारण रूप से कठोर हैं और इनका असमान प्रयोग संभव है। BJP का 'संघीय व्यवस्था' वाला तर्क विडंबनापूर्ण है — क्योंकि आलोचकों का कहना है कि स्वयं ये संशोधन राज्यों की स्वायत्त सामाजिक संरचना में केंद्रीय हस्तक्षेप बढ़ाते हैं। असली सवाल यह है कि क्या अन्य विपक्षी-शासित राज्य केरल के नक्शेकदम पर चलेंगे और इस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाएँगे।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल विधानसभा ने एफसीआरए के खिलाफ प्रस्ताव क्यों पारित किया?
केरल विधानसभा ने आरोप लगाया कि केंद्र के प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन एनजीओ और सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर करते हैं और उन्हें केंद्रीय नियंत्रण में लाते हैं। विधानसभा ने 1 जुलाई 2026 को 111-2 के बहुमत से यह प्रस्ताव पारित कर केंद्र से सभी प्रस्तावित संशोधन वापस लेने की माँग की।
एफसीआरए संशोधन नियम 2026 में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
प्रस्तावित बदलावों के तहत संस्थाओं की गतिविधियाँ 105 निर्धारित क्षेत्रों तक सीमित होंगी, पंजीकरण राज्य के बाहर काम करने पर नया पंजीकरण अनिवार्य होगा, और तकनीकी चूक पर 30% तक जुर्माना लगाया जा सकेगा। पदाधिकारियों के सोशल मीडिया खातों की जानकारी देना भी अनिवार्य किया गया है।
BJP ने इस प्रस्ताव का विरोध क्यों किया?
BJP विधायक वी. मुरलीधरन ने तर्क दिया कि राज्य विधानसभा को संसद द्वारा बनाए गए कानूनों में बदलाव की माँग करने का अधिकार नहीं है और यह प्रस्ताव संघीय व्यवस्था के सिद्धांतों के विरुद्ध है। BJP के दोनों विधायकों ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।
इन संशोधनों से किन संस्थाओं पर असर पड़ेगा?
मुख्यमंत्री वीडी सतीशन के अनुसार, इन बदलावों का असर उन संस्थाओं पर पड़ेगा जो जनकल्याण, स्वास्थ्य, शिक्षा, दिव्यांग पुनर्वास, आपदा राहत और आदिवासी-कल्याण के क्षेत्र में काम करती हैं। केरल में ये संस्थाएँ सरकार के साथ मिलकर जरूरी सेवाएँ प्रदान करती हैं।
क्या केरल विधानसभा का यह प्रस्ताव केंद्र पर बाध्यकारी है?
नहीं, राज्य विधानसभा का यह प्रस्ताव केंद्र सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। यह एक औपचारिक अपील है जो केंद्र-राज्य संबंधों में राजनीतिक दबाव बनाने का काम कर सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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