मुंह के कैंसर की जल्द पहचान के लिए केरल में 'कैनवीन' के तहत 6,500 डेंटल क्लीनिकों का नेटवर्क

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मुंह के कैंसर की जल्द पहचान के लिए केरल में 'कैनवीन' के तहत 6,500 डेंटल क्लीनिकों का नेटवर्क

सारांश

केरल में 'कैनवीन' के तहत 6,500 डेंटल क्लीनिकों को मुंह के कैंसर की शुरुआती पहचान के केंद्रों में बदला जाएगा। भारत में 30% कैंसर मामले मुंह के हैं और 70% का पता देर से चलता है — यह पहल उस खाई को पाटने की कोशिश है, जहाँ मरीज़ पहले पहुँचते हैं।

मुख्य बातें

इंडियन डेंटल एसोसिएशन (IDA) की अगुवाई में 'कैनवीन' कार्यक्रम के तहत केरल में 20 मई 2025 को राज्यव्यापी डेंटल स्क्रीनिंग नेटवर्क शुरू किया गया।
केरल के लगभग 6,500 डेंटल क्लीनिकों को मुंह के कैंसर की शुरुआती पहचान के केंद्रों में बदला जाएगा।
राष्ट्रीय अनुमानों के अनुसार भारत में कुल कैंसर मामलों में मुंह के कैंसर की हिस्सेदारी लगभग 30% है; 70% से अधिक मामलों का पता उन्नत अवस्था में चलता है।
परियोजना की अनुमानित लागत ₹50 लाख है, जो संस्थागत सहयोग और दान से जुटाई जा रही है।
वीपीएस लेकशोर हॉस्पिटल और चिट्टिलापिल्ली फाउंडेशन प्रमुख सहयोगी संस्थान हैं; आर्थिक रूप से कमज़ोर मरीज़ों के उपचार के लिए भी सहायता का प्रावधान है।

केरल में मुंह के कैंसर की शुरुआती पहचान को सामुदायिक स्तर पर सुदृढ़ करने के लिए 20 मई 2025 को एक महत्वाकांक्षी राज्यव्यापी पहल की शुरुआत की गई है। 'कैनवीन' नामक इस कार्यक्रम के अंतर्गत इंडियन डेंटल एसोसिएशन (IDA) की अगुवाई में केरल भर के लगभग 6,500 डेंटल क्लीनिकों को एक व्यवस्थित स्क्रीनिंग, डॉक्यूमेंटेशन और रेफरल नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इसे राज्य में सामुदायिक स्तर पर मुंह के कैंसर की निगरानी के सबसे बड़े प्रयासों में से एक बताया जा रहा है।

कार्यक्रम की संरचना और भागीदार संस्थान

इस पहल का केंद्रीय घटक 'मौखिक घाव निगरानी कार्यक्रम' (ओरल लेज़न सर्विलेंस प्रोग्राम — OLSP) है। वीपीएस लेकशोर हॉस्पिटल, चिट्टिलापिल्ली फाउंडेशन और अन्य स्वास्थ्य सेवा संस्थान इस अभियान में सहयोगी भूमिका निभा रहे हैं। इसका उद्देश्य राज्य के डेंटल क्लीनिकों को मुंह के कैंसर की प्रारंभिक पहचान के केंद्रों में रूपांतरित करना है।

इस परियोजना पर लगभग ₹50 लाख खर्च होने का अनुमान है, जो विभिन्न संस्थानों के आपसी सहयोग और दान से जुटाई जा रही है। एकत्र धनराशि का एक हिस्सा आर्थिक रूप से कमज़ोर मरीज़ों के इलाज में सहायता के लिए भी रखा जाएगा।

मुंह के कैंसर की गंभीर स्थिति — आँकड़े क्या कहते हैं

राष्ट्रीय कैंसर अनुमानों के अनुसार, भारत में रिपोर्ट किए गए सभी कैंसर मामलों में से लगभग 30 प्रतिशत मुंह के कैंसर के होते हैं। इनमें से 70 प्रतिशत से अधिक मामलों का पता तब चलता है जब बीमारी उन्नत अवस्था में पहुँच चुकी होती है, जिससे उपचार की जटिलता और लागत दोनों बढ़ जाती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती चरण में पहचान होने पर मरीज़ के जीवित रहने की संभावना और उपचार के परिणामों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

डॉ. ईपेन थॉमस ने कहा, 'भारत में मुंह का कैंसर आज भी जन-स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है, क्योंकि कई मरीज़ विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास तब पहुँचते हैं जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। यह पहल शुरुआती दौर में ही बीमारी का पता लगाने और सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग को बढ़ावा देने पर ज़ोर देती है।'

डॉ. मोनी अब्राहम कुरियाकोस ने देर से निदान को मुंह के कैंसर उपचार की सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए कहा, 'इस पहल का मुख्य उद्देश्य यह है कि बीमारी का पता बहुत पहले ही लगा लिया जाए — ठीक उसी जगह पर, जहाँ मरीज़ सबसे पहले इलाज के लिए पहुँचते हैं।'

डॉ. अश्विन मुल्लाथ के अनुसार, इस पहल का लक्ष्य स्क्रीनिंग को डेंटल केयर का नियमित और अनिवार्य हिस्सा बनाना है, ताकि डेंटिस्ट किसी भी संदिग्ध मामले को तत्काल विशेषज्ञों के पास रेफर कर सकें।

डेंटल क्लीनिक क्यों बने अग्रिम पंक्ति का केंद्र

इस कार्यक्रम में डेंटल क्लीनिकों को निगरानी की अग्रिम पंक्ति में रखा गया है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग नियमित दाँत की जाँच और उपचार के लिए दंत चिकित्सकों के पास जाते हैं। एस.के. अब्दुल्ला ने कहा कि यदि सामुदायिक स्तर पर ही शुरुआती पहचान हो जाए, तो देर से सामने आने वाले मामलों में काफी कमी लाई जा सकती है और केरल में मुंह के कैंसर के बोझ को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।

आगे की राह

यह पहल केरल के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव का संकेत देती है — जहाँ कैंसर की पहचान अब केवल विशेषज्ञ अस्पतालों तक सीमित न रहकर, प्राथमिक दंत चिकित्सा स्तर पर ही शुरू होगी। यदि यह मॉडल सफल रहा, तो इसे देश के अन्य राज्यों में भी अपनाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

500 क्लीनिकों को एक मानकीकृत रेफरल प्रणाली में बाँधना प्रशिक्षण, डेटा संग्रह और अनुपालन की दृष्टि से एक बड़ी चुनौती है। ₹50 लाख की लागत इस पैमाने के लिए अपेक्षाकृत सीमित है — असली परीक्षा यह होगी कि स्क्रीनिंग के बाद रेफर हुए मरीज़ वास्तव में विशेषज्ञ तक पहुँच पाते हैं या नहीं। यदि यह मॉडल केवल डेटा संग्रह तक सिमट गया और उपचार तक पहुँच नहीं बढ़ी, तो शुरुआती पहचान का लाभ अधूरा रह जाएगा।
RashtraPress
20 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'कैनवीन' कार्यक्रम क्या है और यह केरल में कैसे काम करेगा?
'कैनवीन' इंडियन डेंटल एसोसिएशन की अगुवाई में शुरू की गई एक राज्यव्यापी पहल है, जिसके तहत केरल के लगभग 6,500 डेंटल क्लीनिकों को मुंह के कैंसर की शुरुआती पहचान के केंद्रों में बदला जाएगा। इसके अंतर्गत 'मौखिक घाव निगरानी कार्यक्रम' (OLSP) के ज़रिए स्क्रीनिंग, डॉक्यूमेंटेशन और विशेषज्ञों को रेफरल की व्यवस्था की जाएगी।
भारत में मुंह के कैंसर की स्थिति कितनी गंभीर है?
राष्ट्रीय कैंसर अनुमानों के अनुसार, भारत में रिपोर्ट होने वाले कुल कैंसर मामलों में से लगभग 30 प्रतिशत मुंह के कैंसर के होते हैं। इनमें से 70 प्रतिशत से अधिक मामलों का पता तब चलता है जब बीमारी उन्नत अवस्था में पहुँच चुकी होती है, जिससे उपचार कठिन और महँगा हो जाता है।
डेंटल क्लीनिकों को इस पहल में क्यों शामिल किया गया है?
डेंटल क्लीनिकों को इसलिए केंद्र में रखा गया है क्योंकि बड़ी संख्या में लोग नियमित दाँत की जाँच के लिए दंत चिकित्सकों के पास जाते हैं। यह मुंह में किसी भी संदिग्ध घाव या लक्षण की शुरुआती पहचान का स्वाभाविक और सुलभ अवसर प्रदान करता है।
इस परियोजना में कितना खर्च होगा और फंडिंग कहाँ से आएगी?
इस परियोजना पर लगभग ₹50 लाख खर्च होने का अनुमान है। यह राशि वीपीएस लेकशोर हॉस्पिटल, चिट्टिलापिल्ली फाउंडेशन और अन्य सहयोगी संस्थानों के आपसी सहयोग तथा दान के ज़रिए जुटाई जा रही है। एकत्र धनराशि का एक हिस्सा आर्थिक रूप से कमज़ोर मरीज़ों के उपचार में भी सहायता के लिए उपयोग किया जाएगा।
शुरुआती पहचान से मुंह के कैंसर के मरीज़ों को क्या फायदा होगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मुंह के कैंसर का पता शुरुआती चरण में लग जाए तो मरीज़ के जीवित रहने की संभावना और उपचार के परिणामों में उल्लेखनीय सुधार होता है। देर से पहचान होने पर उपचार जटिल, महँगा और कम प्रभावी हो जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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