मुंह के कैंसर की जल्द पहचान के लिए केरल में 'कैनवीन' के तहत 6,500 डेंटल क्लीनिकों का नेटवर्क
सारांश
मुख्य बातें
केरल में मुंह के कैंसर की शुरुआती पहचान को सामुदायिक स्तर पर सुदृढ़ करने के लिए 20 मई 2025 को एक महत्वाकांक्षी राज्यव्यापी पहल की शुरुआत की गई है। 'कैनवीन' नामक इस कार्यक्रम के अंतर्गत इंडियन डेंटल एसोसिएशन (IDA) की अगुवाई में केरल भर के लगभग 6,500 डेंटल क्लीनिकों को एक व्यवस्थित स्क्रीनिंग, डॉक्यूमेंटेशन और रेफरल नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। इसे राज्य में सामुदायिक स्तर पर मुंह के कैंसर की निगरानी के सबसे बड़े प्रयासों में से एक बताया जा रहा है।
कार्यक्रम की संरचना और भागीदार संस्थान
इस पहल का केंद्रीय घटक 'मौखिक घाव निगरानी कार्यक्रम' (ओरल लेज़न सर्विलेंस प्रोग्राम — OLSP) है। वीपीएस लेकशोर हॉस्पिटल, चिट्टिलापिल्ली फाउंडेशन और अन्य स्वास्थ्य सेवा संस्थान इस अभियान में सहयोगी भूमिका निभा रहे हैं। इसका उद्देश्य राज्य के डेंटल क्लीनिकों को मुंह के कैंसर की प्रारंभिक पहचान के केंद्रों में रूपांतरित करना है।
इस परियोजना पर लगभग ₹50 लाख खर्च होने का अनुमान है, जो विभिन्न संस्थानों के आपसी सहयोग और दान से जुटाई जा रही है। एकत्र धनराशि का एक हिस्सा आर्थिक रूप से कमज़ोर मरीज़ों के इलाज में सहायता के लिए भी रखा जाएगा।
मुंह के कैंसर की गंभीर स्थिति — आँकड़े क्या कहते हैं
राष्ट्रीय कैंसर अनुमानों के अनुसार, भारत में रिपोर्ट किए गए सभी कैंसर मामलों में से लगभग 30 प्रतिशत मुंह के कैंसर के होते हैं। इनमें से 70 प्रतिशत से अधिक मामलों का पता तब चलता है जब बीमारी उन्नत अवस्था में पहुँच चुकी होती है, जिससे उपचार की जटिलता और लागत दोनों बढ़ जाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती चरण में पहचान होने पर मरीज़ के जीवित रहने की संभावना और उपचार के परिणामों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
डॉ. ईपेन थॉमस ने कहा, 'भारत में मुंह का कैंसर आज भी जन-स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है, क्योंकि कई मरीज़ विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास तब पहुँचते हैं जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। यह पहल शुरुआती दौर में ही बीमारी का पता लगाने और सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग को बढ़ावा देने पर ज़ोर देती है।'
डॉ. मोनी अब्राहम कुरियाकोस ने देर से निदान को मुंह के कैंसर उपचार की सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए कहा, 'इस पहल का मुख्य उद्देश्य यह है कि बीमारी का पता बहुत पहले ही लगा लिया जाए — ठीक उसी जगह पर, जहाँ मरीज़ सबसे पहले इलाज के लिए पहुँचते हैं।'
डॉ. अश्विन मुल्लाथ के अनुसार, इस पहल का लक्ष्य स्क्रीनिंग को डेंटल केयर का नियमित और अनिवार्य हिस्सा बनाना है, ताकि डेंटिस्ट किसी भी संदिग्ध मामले को तत्काल विशेषज्ञों के पास रेफर कर सकें।
डेंटल क्लीनिक क्यों बने अग्रिम पंक्ति का केंद्र
इस कार्यक्रम में डेंटल क्लीनिकों को निगरानी की अग्रिम पंक्ति में रखा गया है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग नियमित दाँत की जाँच और उपचार के लिए दंत चिकित्सकों के पास जाते हैं। एस.के. अब्दुल्ला ने कहा कि यदि सामुदायिक स्तर पर ही शुरुआती पहचान हो जाए, तो देर से सामने आने वाले मामलों में काफी कमी लाई जा सकती है और केरल में मुंह के कैंसर के बोझ को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।
आगे की राह
यह पहल केरल के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव का संकेत देती है — जहाँ कैंसर की पहचान अब केवल विशेषज्ञ अस्पतालों तक सीमित न रहकर, प्राथमिक दंत चिकित्सा स्तर पर ही शुरू होगी। यदि यह मॉडल सफल रहा, तो इसे देश के अन्य राज्यों में भी अपनाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।