केरल SMA दवा विवाद: CM सतीशन बोले — 'गरीब बच्चों को ₹65 लाख की दवा ₹15,000 में देना हमारी जिम्मेदारी'
सारांश
मुख्य बातें
केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने 26 अक्टूबर 2026 को तिरुवनंतपुरम में राज्य विधानसभा के पटल पर स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) से पीड़ित बच्चों को भारत निर्मित कम लागत वाली जेनेरिक दवा उपलब्ध कराने के सरकारी फैसले का कड़ा बचाव किया। लगभग ₹65 लाख की बाज़ार कीमत वाली इस दवा की 12 दिन की खुराक अब राज्य सरकार मात्र ₹15,000 में दे रही है — और यही किफायती कदम अब एक बड़े राजनीतिक विवाद की जड़ बन गया है।
मुख्य घटनाक्रम
विवाद तब सतह पर आया जब तिरुवनंतपुरम के श्री अविट्टम थिरुनाल (SAT) अस्पताल में बच्चों को दिए गए दवा के पैकेटों पर 'चिकित्सक का नमूना' और 'केवल नैदानिक परीक्षणों के लिए' जैसे लेबल पाए गए। इन लेबलों ने अभिभावकों में यह आशंका पैदा कर दी कि उनके बच्चों को परीक्षण चरण की दवाएं दी जा रही हैं।
विपक्ष ने इस मुद्दे को लपक लिया। उल्लेखनीय है कि आलोचकों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — CPI(M) के तीन पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भी शामिल हैं, जिन्होंने दवा की सुरक्षा और उसकी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।
सरकार का पक्ष
मुख्यमंत्री सतीशन ने विधानसभा में सीधे सवाल उठाया — "गरीब बच्चों को कम कीमत पर दवा देने में क्या बुराई है?" उन्होंने विपक्ष पर पलटवार करते हुए पूछा कि क्या आलोचकों की असली आपत्ति इलाज की लागत में भारी कमी को लेकर है।
स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने स्पष्ट किया कि विवादित लेबल वाले पैकेट अस्थायी आपूर्ति कमी के दौरान वितरित किए गए नमूना स्टॉक पर थे। सरकार के अनुसार, हैदराबाद स्थित नैटको फार्मा द्वारा निर्मित और 'नैटस्मार्ट' ब्रांड नाम से बेची जा रही यह जेनेरिक दवा विशेषज्ञों का समर्थन और आवश्यक नियामक मंजूरी प्राप्त कर चुकी है।
मुरलीधरन ने विधानसभा को यह भी बताया कि पिछली पिनाराई विजयन सरकार के कार्यकाल में खरीदी गई SMA दवाओं के लिए ₹50 करोड़ का भुगतान अभी भी बकाया है। उन्होंने आलोचकों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्होंने मंत्री बनने के बाद अपनी बहू को रसोइया नियुक्त करने की आदत नहीं डाली थी।
SMA क्या है और दवा इतनी महंगी क्यों
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार है जिसमें मांसपेशियों में धीरे धीरे कमज़ोरी आती है और यह मुख्यतः शिशुओं व छोटे बच्चों को प्रभावित करती है। इस बीमारी का उपचार वैश्विक स्तर पर सबसे महंगे इलाजों में गिना जाता है। भारत में ब्रांडेड दवा की कीमत करीब ₹65 लाख प्रति उपचार चक्र है, जो अधिकांश परिवारों की पहुंच से बाहर है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में दुर्लभ बीमारियों के इलाज की सुलभता को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ी हुई है। जेनेरिक विकल्प की उपलब्धता इस संदर्भ में प्रभावित परिवारों के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।
आम जनता पर असर
मुरलीधरन ने स्पष्ट किया कि सरकार किफायती कीमत पर SMA दवा की आपूर्ति जारी रखेगी। उनका तर्क है कि सस्ती दवा की उपलब्धता से अधिक से अधिक बच्चे इलाज का लाभ उठा सकेंगे — जो अन्यथा आर्थिक कारणों से उपचार से वंचित रह जाते।
सतीशन ने स्वास्थ्य मंत्री मुरलीधरन और स्वास्थ्य विभाग को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। हालांकि, अभिभावकों की चिंताएं और लेबल विवाद का पूर्ण समाधान अभी बाकी है।
क्या होगा आगे
विपक्ष लेबल वाली दवाओं को लेकर जवाबदेही की मांग पर अड़ा हुआ है, जबकि सरकार का कहना है कि जेनेरिक दवा की आपूर्ति श्रृंखला सुव्यवस्थित है। गौरतलब है कि यह विवाद केरल में स्वास्थ्य नीति की दिशा और दुर्लभ रोगों के इलाज में सरकारी हस्तक्षेप की सीमा पर एक व्यापक राजनीतिक बहस को जन्म दे सकता है। नियामक स्पष्टता और दवा की गुणवत्ता सत्यापन की माँग आने वाले दिनों में और तेज़ होने की संभावना है।