केरल बिजली संकट: सतीशन सरकार विपक्ष के निशाने पर, ₹30/यूनिट खरीद पर फैसला अटका
सारांश
मुख्य बातें
केरल में बिजली कटौती का संकट मुख्यमंत्री वीडी सतीशन की सरकार के लिए पहली बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक परीक्षा बन गया है। 15 सितंबर 2026 तक लगातार हो रही बिजली कटौती से आम जनता परेशान है और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे ने इस मुद्दे को नई सरकार की विफलता के रूप में पेश करते हुए हमला तेज कर दिया है।
मुख्य घटनाक्रम
बिजली मंत्री सनी जोसेफ ने मंगलवार को स्वीकार किया कि एनटीपीसी से करीब ₹30 प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदने पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। इससे संकट की अनिश्चितता और गहरी हो गई है। मंत्री ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि मौजूदा कटौती कब तक जारी रहेगी, केवल इतना कहा कि सरकार संकट को जल्द सुलझाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है।
महंगी बिजली खरीद के लिए कैबिनेट की मंजूरी अनिवार्य होगी क्योंकि इतनी ऊँची दर पर खरीद से राज्य पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि 300 मेगावाट बिजली लगातार ₹30 प्रति यूनिट की दर से खरीदी जाती है, तो प्रतिदिन का खर्च करीब ₹2.16 करोड़ और 30 दिनों में लगभग ₹65 करोड़ बैठेगा।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
सीपीआई(एम) नेतृत्व वाले वाम मोर्चे ने तर्क दिया है कि पिनाराई विजयन सरकार के 10 वर्षों के कार्यकाल में केरल में रोज़ाना होने वाली निर्धारित बिजली कटौती लगभग समाप्त हो गई थी। विपक्ष इस स्थिति की तुलना पिछले एक दशक से करते हुए इसे सतीशन सरकार की प्रशासनिक नाकामी करार दे रहा है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब नई सरकार को सत्ता में आए अभी कुछ ही महीने हुए हैं और बिजली संकट का यह मुद्दा विपक्ष को लंबे समय तक हमले का अवसर दे सकता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
इंजीनियरिंग फिजिसिस्ट और बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञ केएस मनोज ने कहा कि इस संकट ने केरल की बिजली व्यवस्था की गहरी कमजोरियों को उजागर किया है — जिसमें बाहरी बिजली पर अत्यधिक निर्भरता, खरीद लागत में उतार-चढ़ाव और दीर्घकालिक योजना का अभाव शामिल है।
उन्होंने कहा, 'फिलहाल सवाल सिस्टम को चालू रखने की लागत का है। असली खर्च खरीदी गई बिजली की मात्रा, अवधि और अनुबंध की शर्तों पर निर्भर करेगा।' केएस मनोज ने यह भी कहा कि केरल राज्य विद्युत बोर्ड (KSEB) को पावर सिस्टम प्रबंधन में माहिर पूर्णकालिक पेशेवर अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक की आवश्यकता है, जो तकनीकी ज्ञान, प्रबंधन क्षमता और जवाबदेही से लैस हो।
केरल की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति पर सवाल
इस संकट ने राज्य की ऊर्जा नीति को लेकर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केरल को मांग में बढ़ोतरी, जलविद्युत की उपलब्धता, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, ऊर्जा भंडारण और राष्ट्रीय स्तर पर बिजली कमी की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए 15 से 20 साल की एकीकृत योजना बनानी होगी।
ध्यान केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पीक डिमांड के समय सुनिश्चित और लचीली आपूर्ति पर केंद्रित होना चाहिए। हाइड्रो और पंप स्टोरेज क्षमता, बैटरी स्टोरेज, नवीकरणीय उत्पादन, डिमांड रिस्पॉन्स और विविध खरीद पोर्टफोलियो ऐसी रणनीति के अनिवार्य अंग होने चाहिए।
क्या होगा आगे
पूर्व में किए गए दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते भी इस संकट के कारण पुनः जाँच के दायरे में आ सकते हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि इन समझौतों की समीक्षा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय ऑडिट के माध्यम से होनी चाहिए। सतीशन सरकार के लिए असली परीक्षा यही है कि जब तक आपूर्ति स्थिर नहीं होती, विपक्ष इस कटौती को प्रशासनिक विफलता के रूप में भुनाता रहेगा।