त्रिपुरा में खारची पूजा 2025 शुरू: 14 देवताओं की पूजा, थीम 'एक पेड़, मां के नाम'
सारांश
मुख्य बातें
त्रिपुरा की ऐतिहासिक खारची पूजा बुधवार, 22 जुलाई को पुरानी राजधानी पुरान हवेली (खयरपुर) में विधिवत आरंभ हुई — अगरतला से लगभग 8 किलोमीटर उत्तर में स्थित इस स्थल पर सात दिवसीय मेले और धार्मिक अनुष्ठानों का भव्य आगाज़ हुआ। इस वर्ष उत्सव की थीम 'एक पेड़, मां के नाम' रखी गई है, जिसके तहत मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को विभिन्न प्रजातियों के पौधे निःशुल्क वितरित किए जाएंगे।
उद्घाटन और मुख्य अनुष्ठान
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने अन्य गणमान्य अतिथियों के साथ इस सात दिवसीय महोत्सव का उद्घाटन किया। खारची पूजा की सबसे विशिष्ट परंपरा यह है कि इसमें एक साथ 14 देवताओं — शिव, दुर्गा, विष्णु, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय, गणेश, ब्रह्मा, अबधी (जल देवता), चंद्र, गंगा, अग्नि, कामदेव और हिमाद्रि (हिमालय) — की पूजा-अर्चना की जाती है। विशेष बात यह है कि इन देवताओं की पूर्ण प्रतिमाएं नहीं, बल्कि केवल उनके पवित्र मस्तक (सिर) की पूजा की जाती है, जो इस उत्सव को अन्य हिंदू परंपराओं से अलग बनाती है।
सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, उत्सव की शुरुआत एक भव्य शोभायात्रा से होती है जिसमें देवताओं की प्रतिमाओं को विशेष जुलूस के साथ बाहर निकाला जाता है। त्रिपुरा पुलिस बैंड इस जुलूस का हिस्सा होता है और मुख्य राजपुरोहित को औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है — एक परंपरा जो इस उत्सव की शाही विरासत को जीवित रखती है।
हरित त्रिपुरा की थीम और पर्यावरण पहल
खारची पूजा एवं मेला समिति के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री रतन चक्रवर्ती ने बताया कि इस वर्ष की थीम 'एक पेड़, मां के नाम' हरित त्रिपुरा के निर्माण के उद्देश्य से तय की गई है। मेले के सात दिनों के दौरान सरकारी पहल के तहत श्रद्धालुओं और पर्यटकों को विभिन्न प्रजातियों के पौधे नि:शुल्क दिए जाएंगे। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष चक्रवर्ती ने उम्मीद जताई कि यदि मौसम अनुकूल रहा तो इस बार श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्ष से अधिक होगी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि पड़ोसी देश बांग्लादेश की मौजूदा परिस्थितियों के कारण सीमा पार से आने वाले आगंतुकों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में कम रह सकती है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
खारची पूजा मूल रूप से त्रिपुरा के आदिवासी त्रिपुरी समुदाय की परंपरा से जुड़ी थी, परंतु समय के साथ यह सभी समुदायों और धर्मों के लोगों का साझा उत्सव बन चुकी है। मान्यता है कि यह पूजा मनुष्यों के पापों के शुद्धिकरण का प्रतीक है।
ऐतिहासिक दृष्टि से, पुरान हवेली करीब 78 वर्षों तक — 1760 से 1838 तक — त्रिपुरा राज्य की राजधानी रही। राजा कृष्ण माणिक्य बहादुर (1760–1783) ने 1760 में राजधानी उदयपुर से यहाँ स्थानांतरित की थी और इसी काल में 14 देवताओं का मंदिर निर्मित हुआ जो आज भी त्रिपुरा की समृद्ध विरासत का प्रतीक है। बाद में 1838 में राजा कृष्ण किशोर माणिक्य बहादुर (1830–1849) ने राजधानी को अगरतला स्थानांतरित कर दिया।
गौरतलब है कि 15 अक्टूबर 1949 को तत्कालीन रीजेंट महारानी कंचन प्रभा देवी और भारत के गवर्नर जनरल के बीच हुए विलय समझौते में यह व्यवस्था की गई थी कि त्रिपुरा सरकार 14 मंदिरों और उनसे जुड़े धार्मिक आयोजनों — जिनमें खारची पूजा और देश के 51 शक्तिपीठों में से एक माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर शामिल हैं — को संरक्षण और आर्थिक सहायता देती रहेगी। इसी कारण राज्य सरकार पिछले कई दशकों से इस पूजा का संपूर्ण खर्च वहन करती आ रही है।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री की शुभकामनाएं
त्रिपुरा के राज्यपाल इंद्र सेना रेड्डी नल्लू ने अपने संदेश में कहा कि खारची पूजा राज्य के सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है और यह लोगों के जीवन में खुशी, प्रेम, शांति, समृद्धि और भाईचारे की भावना लेकर आए।
मुख्यमंत्री माणिक साहा ने कहा कि यह पारंपरिक उत्सव पीढ़ियों से सांप्रदायिक सौहार्द, सद्भावना, एकता और सामाजिक समरसता का प्रतीक रहा है। उन्होंने कहा कि जाति, जनजाति, धर्म और पंथ से ऊपर उठकर सभी समुदायों की भागीदारी ने खारची उत्सव को सामाजिक एकता और सार्वभौमिक सद्भाव का महोत्सव बना दिया है।
आगे क्या
सात दिनों तक चलने वाले इस मेले में देशभर से लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के पहुँचने की उम्मीद है। रंग-बिरंगे पंडाल, आकर्षक रोशनी, वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक ढोल की धुनों के साथ यह उत्सव त्रिपुरा की सांप्रदायिक सद्भावना और सांस्कृतिक समावेशिता को एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करेगा।