कोणार्क सूर्य मंदिर में अक्टूबर से टनल खुदाई: ASI-IIT ने मेटल फ्रेम और संरचना का किया गहन निरीक्षण
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ओडिशा के विश्वप्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर में संरक्षण कार्य को एक निर्णायक चरण में पहुँचाने की तैयारी शुरू कर दी है। ASI के सुपरिटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट एवं रीजनल डायरेक्टर डॉ. मिलन कुमार चौले के अनुसार, ASI एडीजी जान्हवी शर्मा और कोर कमेटी ने साइट का विस्तृत निरीक्षण किया तथा प्रस्तावित टनल खुदाई के लिए मेटल फ्रेम की समीक्षा की। सुरक्षा मानकों और मानसून के बाद की मौसम स्थितियों के अनुकूल होने पर अक्टूबर 2026 के आसपास खुदाई का काम शुरू होने की योजना है।
निरीक्षण में क्या हुआ
ASI एडीजी जान्हवी शर्मा की अध्यक्षता में कोर कमेटी ने 20 अगस्त 2026 को स्थल का भौतिक निरीक्षण किया। टीम ने संरचना के प्रत्येक पहलू को बारीकी से देखा, तस्वीरें लीं और दस्तावेज़ीकरण किया। कोणार्क मंदिर के प्रवेश हॉल के ऊपरी हिस्से का भी दौरा किया गया, जहाँ चल रहे संरक्षण एवं पुनरुद्धार कार्य का ब्लूप्रिंट के संदर्भ में मूल्यांकन किया गया।
निरीक्षण से एक दिन पहले कमेटी की कार्यालय में बैठक हुई थी, जिसमें दो विशेषज्ञ भौतिक रूप से उपस्थित न हो पाने के कारण ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। डॉ. चौले ने स्पष्ट किया कि ऑनलाइन बैठक में साइट का सही आकलन संभव नहीं होता, इसलिए जमीनी निरीक्षण अनिवार्य था।
IIT की भूमिका और तकनीकी तैयारी
आईआईटी इस परियोजना का तकनीकी सलाहकार है। डॉ. चौले के अनुसार, आईआईटी ने संरचना में उत्पन्न होने वाले तनाव (स्ट्रेस) का आकलन करने और उसकी निगरानी की प्रणाली तय करने के लिए 2D एवं 3D डिजाइन तैयार किए हैं। आईआईटी ने अब लगभग 2 मीटर × 2.3 मीटर और 60-70 सेंटीमीटर मोटाई का एक हिस्सा काटने की अनुमति दे दी है। इसके अतिरिक्त टनल कार्य के लिए एक और प्रस्ताव भी जमा किया गया है, जिसकी गणना पूरी होने के बाद ही अगला कदम उठाया जाएगा।
डॉ. चौले ने कहा, 'एक बार जब हम काम शुरू करेंगे तो हमें सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार रहना होगा, इसलिए सुरक्षा पहलुओं को लेकर पूरी तरह संतुष्ट होना ज़रूरी है।'
संरचना की स्थिति और ऐतिहासिक संदर्भ
डॉ. चौले ने बताया कि मंदिर की संरचना अभी भी काफी स्थिर और अच्छी स्थिति में है। इसका श्रेय उन्होंने ब्रिटिश इंजीनियरों के उस निर्णय को दिया, जिन्होंने मंदिर की भराई में समुद्री रेत के स्थान पर नदी की रेत का उपयोग किया था। उनके अनुसार, यदि समुद्री रेत का प्रयोग होता तो पत्थरों पर सफेदी आ जाती और वे कहीं अधिक तेज़ी से क्षतिग्रस्त हो जाते।
गौरतलब है कि कोणार्क सूर्य मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और इसके संरक्षण को लेकर दशकों से विशेषज्ञ बहस होती रही है। टनल खुदाई की यह योजना मंदिर के आंतरिक ढाँचे को समझने और उसे दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
कोर कमेटी की संरचना
कोर कमेटी का नेतृत्व एडीजी जान्हवी शर्मा कर रही हैं। इसमें प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर अशोक बसत, स्ट्रक्चरल इंजीनियर लोकनाथ बेहरा, आईआईटी चेन्नई के मेनन और आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर दीप्ति रंजन साहू शामिल हैं। इसके अतिरिक्त ओडिशा के दो-तीन पुरातत्वविद्, ASI के दो सेवानिवृत्त अधिकारी, राज्य पुरातत्व विभाग के एक सेवानिवृत्त अधिकारी और उत्कल विश्वविद्यालय के एक पूर्व प्रोफेसर भी कमेटी के सदस्य हैं।
आगे की राह
अक्टूबर में काम शुरू होने से पहले आईआईटी से अंतिम संरचनात्मक गणना प्राप्त करना और मानसून के बाद मौसम अनुकूल होने की प्रतीक्षा करना — दोनों अनिवार्य शर्तें हैं। डॉ. चौले ने स्पष्ट किया कि यदि गणना में कोई त्रुटि हुई तो पूरा आकलन प्रभावित हो सकता है, इसलिए जल्दबाजी से बचा जा रहा है। मेटल फ्रेम की मजबूती और टिकाऊपन की जाँच के बाद यह भी तय किया जाएगा कि उसमें किन सुधारों की आवश्यकता है।