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कावेरी विवाद: कुमारस्वामी का शिवकुमार सरकार पर हमला — 'कानूनी टीम को अंधेरे में रखा'

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कावेरी विवाद: कुमारस्वामी का शिवकुमार सरकार पर हमला — 'कानूनी टीम को अंधेरे में रखा'

सारांश

केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने नई दिल्ली में कर्नाटक सरकार पर सीधा हमला बोला — आरोप है कि वरिष्ठ वकीलों को बैठकों में कुर्सी तक नहीं दी गई, जबकि तमिलनाडु कावेरी प्राधिकरणों में अपना पक्ष मजबूत करता रहा और कर्नाटक के किसान फसल बर्बादी झेलते रहे।

मुख्य बातें

केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने 12 अगस्त को नई दिल्ली में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की सरकार पर कावेरी विवाद को गलत तरीके से संभालने का आरोप लगाया।
वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन कटारकी को कर्नाटक भवन की बैठक में बैठने के लिए कुर्सी न मिलने पर वे बैठक छोड़कर चले गए।
सीडब्ल्यूएमए और सीडब्ल्यूआरसी ने कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को छोड़ने की सिफारिश की है।
तमिलनाडु ने मई में ही कावेरी प्राधिकरणों के सामने अपना पक्ष रख दिया था; कर्नाटक को जून से पानी छोड़ना था।
कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि शिवकुमार कावेरी से ज्यादा कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और कैबिनेट विस्तार को प्राथमिकता दे रहे हैं।
संकटकालीन जल बंटवारा फॉर्मूला पर अभी तक सुप्रीम कोर्ट का कोई अंतिम आदेश नहीं आया है।

केंद्रीय भारी उद्योग एवं इस्पात मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने बुधवार, 12 अगस्त को नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कर्नाटक सरकार पर गंभीर आरोप लगाए — उनका कहना था कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने कावेरी जल विवाद को बुरी तरह गलत तरीके से संभाला है और राज्य के कानूनी विशेषज्ञों को आवश्यक जानकारी से जानबूझकर दूर रखा। कुमारस्वामी के अनुसार, इस लापरवाही का सीधा फायदा तमिलनाडु उठा रहा है, जबकि कर्नाटक के किसान भुगत रहे हैं।

कानूनी विशेषज्ञों की अनदेखी का आरोप

कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि नई दिल्ली स्थित कर्नाटक भवन में मुख्यमंत्री शिवकुमार द्वारा बुलाई गई सांसदों की बैठक में वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन कटारकी को बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दी गई, जिसके बाद वे बैठक छोड़कर चले गए। उन्होंने कहा कि बेंगलुरु के कृष्णा कार्यालय में आयोजित सर्वदलीय बैठक में भी कानूनी विशेषज्ञों को पर्याप्त महत्व नहीं मिला।

कुमारस्वामी ने कहा, 'जब इस तरह की बैठकें बुलाई जाती हैं तो उसमें कानूनी और तकनीकी पहलुओं को सभी के सामने रखा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री को बैठक की शुरुआत में ही कानूनी विशेषज्ञों की राय लेनी चाहिए थी। इस तरह विशेषज्ञों की अनदेखी करना दूरदर्शिता और तैयारी की कमी को दिखाता है।'

सीडब्ल्यूएमए की सिफारिश और तमिलनाडु की सतर्कता

कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) और कावेरी जल विनियमन समिति (सीडब्ल्यूआरसी) दोनों ने कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को छोड़ने की सिफारिश की है। कुमारस्वामी के अनुसार, तमिलनाडु ने मई महीने में ही कावेरी प्राधिकरणों के सामने अपना पक्ष मजबूती से रख दिया था, जबकि कर्नाटक को जून से पानी छोड़ना शुरू करना था।

उन्होंने आरोप लगाया कि तमिलनाडु प्रशासनिक और कानूनी — दोनों मोर्चों पर सक्रिय रहा, जबकि कर्नाटक सरकार निष्क्रिय बनी रही। यह ऐसे समय में आया है जब संकटकालीन जल बंटवारा फॉर्मूला (डिस्ट्रेस शेयरिंग फॉर्मूला) पर अभी तक सुप्रीम कोर्ट का कोई अंतिम आदेश नहीं आया है।

किसानों पर असर

कुमारस्वामी ने कहा कि राज्य की कानूनी लड़ाई मजबूत करने के बजाय मुख्यमंत्री ने कावेरी और कृष्णा बेसिन के किसानों को अधिक पानी की जरूरत वाली फसलें न उगाने की सलाह दी। उनके अनुसार, 'इसका नुकसान हमारे किसानों को हुआ। पानी की कमी के कारण पहले से बोई गई फसलें भी बर्बाद हो गईं।'

गौरतलब है कि कावेरी जल विवाद दशकों पुराना है और हर बार अपर्याप्त वर्षा के मौसम में तीखा रूप धारण कर लेता है। आलोचकों का कहना है कि कर्नाटक की सरकारें — चाहे किसी भी दल की रही हों — इस मुद्दे पर दीर्घकालिक कानूनी रणनीति बनाने में बार-बार चूकती रही हैं।

राजनीतिक हमला: कैबिनेट विस्तार बनाम कावेरी

कुमारस्वामी ने तीखा राजनीतिक प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री शिवकुमार कावेरी संकट से ज्यादा कैबिनेट विस्तार और विभागों के बंटवारे को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने कहा, 'कावेरी मुद्दे को छोड़कर वे मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणुगोपाल और रणदीप सिंह सुरजेवाला के घरों के चक्कर लगा रहे हैं।'

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री बनने से पहले शिवकुमार तीन साल तक जल संसाधन मंत्री थे — उस दौरान कावेरी मुद्दे पर क्या तैयारी की गई?

आगे क्या होगा

कुमारस्वामी ने राज्य सरकार से अपील की कि वह तमिलनाडु की संभावित कानूनी और प्रशासनिक रणनीतियों के लिए पहले से तैयारी करे। उन्होंने जोर दिया कि कर्नाटक को संकट आने के बाद प्रतिक्रिया देने की बजाय सक्रिय रूप से कदम उठाने चाहिए। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में आगामी सुनवाई को देखते हुए राज्य सरकार की कानूनी तैयारी की परीक्षा जल्द होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

अगर सत्य है, तो यह प्रशासनिक संस्कृति की गंभीर खामी उजागर करता है। कावेरी जैसे जटिल अंतरराज्यीय जल विवाद में कानूनी टीम की अनदेखी राज्य के दीर्घकालिक हितों को नुकसान पहुँचा सकती है। गौरतलब है कि शिवकुमार खुद तीन साल तक जल संसाधन मंत्री रहे हैं — यह सवाल कि उस दौरान क्या तैयारी हुई, जवाब माँगता है। मुख्यधारा की कवरेज इस विवाद को केवल BJP बनाम कांग्रेस के चश्मे से देखती है, जबकि असली मुद्दा यह है कि कर्नाटक के किसान हर बार इस राजनीतिक अदूरदर्शिता की कीमत चुकाते हैं।
RashtraPress
12 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एचडी कुमारस्वामी ने कर्नाटक सरकार पर क्या आरोप लगाए हैं?
कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि कर्नाटक सरकार ने कावेरी जल विवाद को गलत तरीके से संभाला और राज्य के कानूनी विशेषज्ञों को जरूरी बैठकों से दूर रखा। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री शिवकुमार कावेरी संकट से ज्यादा कैबिनेट विस्तार को प्राथमिकता दे रहे हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन कटारकी का विवाद क्या है?
कुमारस्वामी के अनुसार, नई दिल्ली स्थित कर्नाटक भवन में मुख्यमंत्री शिवकुमार द्वारा बुलाई गई सांसदों की बैठक में वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन कटारकी को बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दी गई, जिसके बाद वे बैठक छोड़कर चले गए। यह घटना कानूनी विशेषज्ञों के प्रति सरकार के रवैये पर सवाल उठाती है।
सीडब्ल्यूएमए ने कर्नाटक को कितना पानी छोड़ने की सिफारिश की है?
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) और कावेरी जल विनियमन समिति (सीडब्ल्यूआरसी) दोनों ने कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को छोड़ने की सिफारिश की है।
कावेरी विवाद में तमिलनाडु की क्या स्थिति है?
कुमारस्वामी के अनुसार, तमिलनाडु ने मई महीने में ही कावेरी प्राधिकरणों के सामने अपना पक्ष मजबूती से रख दिया था, जबकि कर्नाटक को जून से पानी छोड़ना शुरू करना था। उनका आरोप है कि तमिलनाडु प्रशासनिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर सक्रिय रहा और कर्नाटक की चूकों का फायदा उठाता रहा।
कावेरी संकट का कर्नाटक के किसानों पर क्या असर पड़ा है?
कुमारस्वामी ने कहा कि राज्य सरकार ने कावेरी और कृष्णा बेसिन के किसानों को अधिक पानी की जरूरत वाली फसलें न उगाने की सलाह दी, जिससे पहले से बोई गई फसलें भी पानी की कमी के कारण बर्बाद हो गईं। उनके अनुसार, इस कुप्रबंधन का सबसे बड़ा खामियाजा कर्नाटक के किसानों को भुगतना पड़ा।
राष्ट्र प्रेस
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