नदी-जोड़ो परियोजना पर कुमारस्वामी का सवाल: पानी का हिस्सा तय हुए बिना CM शिवकुमार ने सहमति कैसे दी?
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने 10 जुलाई को बेंगलुरु में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर तीखा हमला बोला और पूछा कि कर्नाटक को कृष्णा-गोदावरी-कावेरी नदी-जोड़ो परियोजना में पानी का हिस्सा सुनिश्चित हुए बिना राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव पर सहमति कैसे जता दी। शिवकुमार ने हाल ही में बेलगावी में दावा किया था कि कर्नाटक ने तीन नदियों को जोड़ने की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए अपनी स्वीकृति दे दी है और राज्य ₹1 लाख करोड़ निवेश करने को तैयार है।
मुख्य विवाद: पानी के बंटवारे पर सवाल
कुमारस्वामी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्हें नदियों को जोड़ने के विचार से सैद्धांतिक रूप से कोई आपत्ति नहीं है, परंतु सहमति देने से पहले यह जानना अनिवार्य था कि कर्नाटक को इस परियोजना के तहत वास्तव में कितना पानी मिलेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री राज्य के सिंचाई हितों से जुड़े अत्यंत संवेदनशील मामले पर गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपना रहे हैं।
कुमारस्वामी ने कहा कि नदियों के जल-बंटवारे के मुद्दों को उस तरह नहीं सुलझाया जा सकता जैसे बेंगलुरु में रियल एस्टेट का सौदा होता है। उनके अनुसार, यदि मुख्यमंत्री तकनीकी पहलुओं से अनभिज्ञ थे, तो उन्हें सार्वजनिक बयान देने से पहले सिंचाई विशेषज्ञों, इंजीनियरों और कानूनी टीम से परामर्श लेना चाहिए था।
डीपीआर में कर्नाटक को क्या मिला था
कुमारस्वामी ने 2023 में तैयार विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) का हवाला देते हुए बताया कि कृष्णा-गोदावरी-कावेरी नदी-जोड़ो परियोजना के तहत कुल 247 टीएमसी पानी के उपयोग की योजना बनाई गई थी। उनके अनुसार, इस DPR में आंध्र प्रदेश को 90 टीएमसी, जबकि तेलंगाना और तमिलनाडु को 60-60 टीएमसी पानी आवंटित किया गया था। उन्होंने दावा किया कि प्रारंभिक प्रस्ताव में कर्नाटक के लिए कोई आवंटन नहीं था।
कुमारस्वामी ने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के लगातार प्रयासों के बाद कर्नाटक को बाद में मलाप्रभा नदी से 15 टीएमसी पानी आवंटित किया गया, वह भी केवल पेयजल उपयोग की शर्त के साथ।
तुंगभद्रा जलाशय पर भी उठाए सवाल
केंद्रीय मंत्री ने तुंगभद्रा जलाशय के क्रेस्ट गेट्स के हालिया उद्घाटन का भी जिक्र किया, जिसमें तीन राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए थे। उन्होंने सवाल किया कि जब पड़ोसी राज्यों को पानी से लाभ मिलेगा तो कर्नाटक अकेले खर्च क्यों उठाए। इसके अलावा उन्होंने मुख्यमंत्री की इस बात के लिए भी आलोचना की कि उन्होंने विपक्ष और जनता को बताए बिना ही तुंगभद्रा जलाशय की गाद हटाने (डिसिल्टिंग) के बारे में पड़ोसी राज्यों से चर्चा की।
संस्थागत प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न
कुमारस्वामी ने यह भी पूछा कि क्या कर्नाटक की सहमति की घोषणा से पहले केंद्रीय जल आयोग या राष्ट्रीय जल बोर्ड ने इस प्रस्ताव पर विधिवत चर्चा की थी। उन्होंने मुख्यमंत्री के उस कथित दावे पर भी आपत्ति जताई जिसमें शिवकुमार ने कहा था कि केंद्र सरकार इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करेगी।
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब कर्नाटक में जल-राजनीति पहले से ही संवेदनशील बनी हुई है और अंतरराज्यीय नदी जल विवाद दशकों से अनसुलझे हैं। आने वाले दिनों में राज्य सरकार की ओर से इस मामले पर औपचारिक स्पष्टीकरण की संभावना है।