मेकेदातु परियोजना पर तमिलनाडु से बातचीत को तैयार हैं सीएम शिवकुमार, बोले — 'दोनों राज्यों को होगा फायदा'
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने 18 जून 2026 को स्पष्ट किया कि वे लंबे समय से विवादित मेकेदातु बैलेंसिंग रिजर्वायर और पेयजल परियोजना पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के साथ किसी भी समय बातचीत के लिए तैयार हैं। बेंगलुरु में विधान परिषद चुनाव में मतदान के बाद पत्रकारों से बात करते हुए शिवकुमार ने कहा कि दोनों राज्यों को राजनीति से ऊपर उठकर अपनी जनता के हित में इस मुद्दे को सुलझाना चाहिए।
मुख्यमंत्री का बयान और संवाद की पेशकश
शिवकुमार ने कहा, 'मैं मेकेदातु प्रोजेक्ट के बारे में किसी भी समय तमिलनाडु से बात करने के लिए तैयार हूं। मुझे इस बारे में कोई हिचकिचाहट नहीं है। चाहे तमिलनाडु हो या कर्नाटक, हम एक देश और एक लोग हैं। हम सभी एक ही नदी के पानी पर निर्भर हैं।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि तमिलनाडु के बहुत से लोग कर्नाटक में काम करते हैं और कर्नाटक के लोग भी वहाँ रहते हैं — इसलिए इस मुद्दे को संकीर्ण नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि चूँकि कांग्रेस तमिलनाडु सरकार में सहयोगी है, इसलिए बातचीत की संभावना और भी सुगम है।
परियोजना के फायदे — दोनों राज्यों के लिए
शिवकुमार ने विस्तार से बताया कि प्रस्तावित बैलेंसिंग रिजर्वायर कर्नाटक को कावेरी नदी से जल प्रवाह को नियंत्रित करने में मदद करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि सूखे जैसे कठिन समय में भी तमिलनाडु को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 177 टीएमसी पानी का हिस्सा मिले। उन्होंने कहा, 'बैलेंसिंग रिजर्वायर बनाने का फायदा यह है कि इससे हमें मुश्किल समय में भी तमिलनाडु के 177 टीएमसी पानी के हिस्से की गारंटी देने में मदद मिलेगी।'
जरूरत पड़ने पर मांड्या, हासन, चामराजनगर और तुमकुरु जैसे जिलों के लिए भी पानी छोड़ा जा सकेगा। इसके अलावा यह परियोजना करीब 400 मेगावाट बिजली उत्पादन भी करेगी।
बेंगलुरु की पेयजल जरूरत — प्रमुख कारण
शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि यह परियोजना मुख्यतः पेयजल के लिए है, सिंचाई के लिए नहीं। उन्होंने कहा, 'बेंगलुरु की आबादी तेजी से बढ़ रही है और शहर को अतिरिक्त जल स्रोत की जरूरत है। हम कृष्णा नदी बेसिन से पानी नहीं ला सकते — कावेरी हमारा मुख्य स्रोत है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि सिंचाई के लिए अनुमति से एक भी टीएमसी अधिक पानी नहीं मोड़ा जाएगा।
गौरतलब है कि पिछले साल अकेले 400 टीएमसी से अधिक पानी समुद्र में बह गया, जिसे इस रिजर्वायर के जरिए संरक्षित किया जा सकता था।
कानूनी स्थिति और सुप्रीम कोर्ट का रुख
शिवकुमार ने याद दिलाया कि सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ तमिलनाडु की दलीलें सुन चुकी है और रिव्यू पिटीशन खारिज कर चुकी है। इसके बाद मामला तकनीकी जाँच के लिए केंद्रीय जल आयोग को भेजा गया। उन्होंने कहा, 'जो आदेश दिए गए हैं, वे दोनों राज्यों के लिए फायदेमंद हैं। जब प्रोजेक्ट कर्नाटक की जमीन पर लागू हो रहा है और हम तमिलनाडु को दिया गया पानी का हिस्सा देना जारी रखे हुए हैं, तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।'
राजनीतिक आरोप और आगे की राह
शिवकुमार ने तमिलनाडु की कुछ राजनीतिक पार्टियों पर चुनावी कारणों से इस मुद्दे को उठाते रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, 'कुछ लोग अपनी राजनीतिक वजूद बचाने के लिए यह मुद्दा उठाते रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब और क्या चर्चा करने को बचा है?' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कर्नाटक तमिलनाडु से इस परियोजना के लिए कोई वित्तीय सहायता नहीं माँग रहा। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जेडीएस के सांसद इस मुद्दे पर कर्नाटक के हितों के लिए एकजुट रहेंगे। मेकेदातु परियोजना के भविष्य का निर्णय अब राजनीतिक इच्छाशक्ति और दोनों राज्यों के बीच सौहार्दपूर्ण संवाद पर निर्भर करता है।