मेकेदातु परियोजना: सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की याचिका खारिज की, शिवकुमार बोले — कर्नाटक की जीत
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मंगलवार, 26 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का स्वागत किया, जिसमें मेकेदातु संतुलन जलाशय एवं पेयजल परियोजना के विरुद्ध तमिलनाडु द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया गया। नई दिल्ली स्थित कर्नाटक भवन में मीडिया से बात करते हुए शिवकुमार ने इस फैसले को 'कर्नाटक के लिए खुशखबरी' बताया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने मेकेदातु परियोजना के संदर्भ में तमिलनाडु की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। शिवकुमार ने कहा, 'कर्नाटक की जनता की ओर से हम सर्वोच्च न्यायालय के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय पहले ही एक आदेश में यह निर्देश दे चुका है कि कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए आवंटित 177 टीएमसी जल निर्धारित शर्तों के अधीन छोड़ना होगा।
केंद्र सरकार की भूमिका और डीपीआर
शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि परियोजना पर अंतिम निर्णय अब केंद्र सरकार को लेना है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार फिलहाल संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में है। यह कदम परियोजना को औपचारिक मंजूरी की दिशा में अगला अहम पड़ाव माना जा रहा है।
मेकेदातु विवाद की पृष्ठभूमि
मेकेदातु परियोजना कर्नाटक-तमिलनाडु सीमा के निकट कावेरी नदी पर प्रस्तावित है। कर्नाटक का तर्क है कि यह परियोजना बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराने के साथ-साथ जलविद्युत उत्पादन के लिए अनिवार्य है। राज्य का यह भी कहना है कि इससे तमिलनाडु के कावेरी जल-हिस्से पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप होगी।
तमिलनाडु की आपत्तियाँ
तमिलनाडु ने इस परियोजना का कड़ा विरोध किया है। पड़ोसी राज्य का आरोप है कि जलाशय बनने से कावेरी डेल्टा क्षेत्र के किसानों को मिलने वाली जल-आपूर्ति घट सकती है। तमिलनाडु का तर्क रहा है कि निचले राज्यों की सहमति और आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरी के बिना कर्नाटक इस परियोजना को आगे नहीं बढ़ा सकता। इस विवाद के कारण दोनों राज्यों के बीच बार-बार राजनीतिक और कानूनी टकराव हो चुके हैं।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद अब परियोजना की राह में एक बड़ी कानूनी बाधा हट गई है। संशोधित डीपीआर केंद्र को सौंपे जाने के बाद केंद्रीय जल आयोग और पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी अगले अनिवार्य चरण होंगे। दोनों राज्यों के बीच कावेरी जल-बंटवारे का दीर्घकालिक विवाद इस परियोजना के क्रियान्वयन को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाए रखेगा।