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तमिलनाडु CM विजय ने PM मोदी को लिखा पत्र, मेकेदातु परियोजना खारिज करने की माँग

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तमिलनाडु CM विजय ने PM मोदी को लिखा पत्र, मेकेदातु परियोजना खारिज करने की माँग

सारांश

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने PM मोदी को पत्र लिखकर मेकेदातु जलाशय परियोजना को खारिज करने की माँग की। उनका तर्क है कि यह 67.16 टीएमसी क्षमता की परियोजना सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले और पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करती है, और कावेरी के पानी पर निर्भर लाखों किसानों के हितों को खतरे में डालती है।

मुख्य बातें

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने 26 मई 2026 को PM मोदी को पत्र लिखकर मेकेदातु परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट खारिज करने की माँग की।
कर्नाटक के प्रस्तावित जलाशय की क्षमता 67.16 टीएमसी है, जो तमिलनाडु के अनियंत्रित जलग्रहण क्षेत्रों से जल प्रवाह को बाधित कर सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय के 16 फरवरी 2018 के फैसले में मेकेदातु को मंजूरी प्राप्त परियोजनाओं में शामिल नहीं किया गया था।
पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने 2019 में कर्नाटक के पर्यावरणीय अध्ययन प्रस्ताव को वापस लौटाया था।
विजय ने जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग को परियोजना रिपोर्ट नामंजूर करने का निर्देश देने का अनुरोध किया।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने 26 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह कावेरी नदी पर कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु जलाशय परियोजना को अस्वीकार करे। उनका कहना है कि यह परियोजना सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करती है और कावेरी के पानी पर निर्भर लाखों किसानों के हितों को गंभीर खतरे में डालती है।

मुख्य घटनाक्रम

मुख्यमंत्री विजय ने अपने पत्र में कर्नाटक के उस कथित निर्णय पर गहरी चिंता व्यक्त की, जिसमें मेकेदातु प्रोजेक्ट के लिए भूमि पूजन करने की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री के सार्वजनिक बयानों से तमिलनाडु के किसानों में बेचैनी फैल गई है, जिनकी आजीविका सीधे तौर पर कावेरी नदी के जल पर निर्भर है।

गौरतलब है कि कावेरी जल विवाद को सुलझाने में लगभग तीन दशक की कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी। अब सर्वोच्च न्यायालय का 16 फरवरी 2018 का फैसला लागू किया जा रहा है।

कानूनी और तकनीकी आपत्तियाँ

सीएम विजय ने स्पष्ट किया कि मेकेदातु प्रोजेक्ट उन परियोजनाओं में शामिल नहीं था जिन्हें कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम फैसले के तहत मंजूरी मिली थी, और बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस तथ्य को सही ठहराया था।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कावेरी बेसिन को पहले से ही जल-अभाव वाले बेसिन की श्रेणी में रखा गया है और उपलब्ध जल संसाधनों का बंटवारा बेसिन राज्यों के बीच 50 प्रतिशत निर्भरता के आधार पर पहले ही किया जा चुका है। इस आधार पर उन्होंने तर्क दिया कि नदी या उसकी सहायक नदियों पर कोई नया बड़ा जलाशय बनाने की कोई गुंजाइश नहीं है।

विजय ने यह भी कहा कि तमिलनाडु की सीमा के निकट 67.16 टीएमसी क्षमता वाला प्रस्तावित जलाशय उन अनियंत्रित जलग्रहण क्षेत्रों से आने वाले जल प्रवाह को बाधित कर सकता है, जो तमिलनाडु के जल-हिस्से का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

पर्यावरणीय आपत्तियाँ

मुख्यमंत्री ने पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति का भी हवाला दिया, जिसने 2019 में राज्यों के बीच अनसुलझे मुद्दों का हवाला देते हुए कर्नाटक के पर्यावरणीय अध्ययन प्रस्ताव को वापस लौटा दिया था। उनका कहना है कि इस परियोजना को आगे बढ़ाना न केवल सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का, बल्कि पर्यावरण संबंधी नियमों का भी उल्लंघन होगा।

केंद्र से माँग

तत्काल हस्तक्षेप की माँग करते हुए सीएम विजय ने प्रधानमंत्री मोदी से अनुरोध किया कि वे जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग को यह निर्देश दें कि मेकेदातु प्रोजेक्ट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को खारिज किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि कर्नाटक, अन्य संबंधित राज्यों की सहमति लिए बिना इस परियोजना पर आगे न बढ़े।

यह ऐसे समय में आया है जब अंतर-राज्यीय जल विवाद दक्षिण भारत की राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा बने हुए हैं। अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय और विशेषज्ञ समिति दोनों ने पहले इस परियोजना पर सवाल उठाए हैं। असली सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार इस बार भी 'प्रतीक्षा और देखो' की नीति अपनाएगी, या दोनों राज्यों के बीच मध्यस्थता का कोई सक्रिय प्रयास होगा। दक्षिण भारत में BJP की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए, केंद्र का किसी भी ओर झुकना राजनीतिक रूप से संवेदनशील होगा।
RashtraPress
11 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेकेदातु परियोजना क्या है और इस पर विवाद क्यों है?
मेकेदातु कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक जलाशय परियोजना है जिसकी क्षमता 67.16 टीएमसी है। तमिलनाडु का कहना है कि यह परियोजना सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के फैसले और कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के आदेशों का उल्लंघन करती है, क्योंकि इसे कभी मंजूरी प्राप्त परियोजनाओं में शामिल नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने मेकेदातु पर क्या कहा है?
सर्वोच्च न्यायालय के 16 फरवरी 2018 के फैसले में मेकेदातु को स्वीकृत परियोजनाओं की सूची में नहीं रखा गया था। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऊपरी राज्य ऐसी कोई गतिविधि नहीं कर सकते जिससे निचले राज्यों को मिलने वाले तयशुदा जल हिस्से पर असर पड़े।
तमिलनाडु के किसानों पर इस परियोजना का क्या असर पड़ सकता है?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय के अनुसार, प्रस्तावित जलाशय उन अनियंत्रित जलग्रहण क्षेत्रों से आने वाले जल प्रवाह को बाधित कर सकता है जो तमिलनाडु के जल-हिस्से का अहम हिस्सा हैं। इससे कावेरी के पानी पर निर्भर लाखों किसानों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
पर्यावरण मंत्रालय ने इस परियोजना पर पहले क्या रुख अपनाया था?
पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने 2019 में राज्यों के बीच अनसुलझे मुद्दों का हवाला देते हुए कर्नाटक के पर्यावरणीय अध्ययन प्रस्ताव को वापस लौटा दिया था। तमिलनाडु ने इसे अपनी आपत्तियों के समर्थन में एक प्रमुख तर्क के रूप में उद्धृत किया है।
CM विजय ने केंद्र सरकार से क्या माँगें की हैं?
मुख्यमंत्री विजय ने PM मोदी से अनुरोध किया है कि जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग को मेकेदातु प्रोजेक्ट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट खारिज करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि कर्नाटक अन्य संबंधित राज्यों की सहमति के बिना इस परियोजना पर आगे न बढ़े।
राष्ट्र प्रेस
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