मेकेदातु परियोजना: कर्नाटक ने कहा — सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी के बाद तमिलनाडु से बातचीत को तैयार
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक सरकार ने 20 जून 2026 को कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना को लेकर अपना आधिकारिक पक्ष सामने रखा और स्पष्ट किया कि इस परियोजना से तमिलनाडु के हिस्से के जल पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तमिलनाडु की याचिका खारिज किए जाने के बाद सभी प्रमुख कानूनी बाधाएं दूर हो चुकी हैं और यदि तमिलनाडु द्विपक्षीय वार्ता के लिए आगे आता है, तो कर्नाटक बातचीत के लिए पूरी तरह तैयार है।
परियोजना के मुख्य उद्देश्य
कर्नाटक सरकार के अनुसार, मेकेदातु परियोजना पूरी तरह कर्नाटक की भौगोलिक सीमा के भीतर निर्मित की जानी है। इसके तीन प्रमुख लक्ष्य हैं — बेंगलुरु क्षेत्र की पेयजल आवश्यकताओं के लिए 4.75 टीएमसी जल का उपयोग, बिलीगुंडलु सीमा बिंदु पर तमिलनाडु के लिए निर्धारित मासिक जल प्रवाह को नियंत्रित एवं सुनिश्चित करना, तथा 400 मेगावाट बिजली उत्पादन करना। सरकार ने यह भी बताया कि सामान्य वर्ष में बिलीगुंडलु पर तमिलनाडु को सालाना 177.25 टीएमसी जल छोड़ना अनिवार्य है और इस व्यवस्था को किसी प्रकार का खतरा नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और कानूनी स्थिति
तमिलनाडु ने 2018 में इस परियोजना को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। 13 नवंबर 2025 को अदालत ने यह याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केंद्रीय जल आयोग और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण इस विषय पर सक्षम विशेषज्ञ संस्थाएं हैं और वे पहले से ही मामले की समीक्षा कर रही हैं। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि कोई भी राज्य किसी अन्य राज्य के आवंटित जल के उपयोग में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक उससे उसके अपने हिस्से का पानी प्रभावित न हो। इसके बाद तमिलनाडु की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका भी 15 अप्रैल 2026 को खारिज कर दी गई।
डीपीआर और केंद्रीय समीक्षा
कर्नाटक सरकार ने बताया कि मेकेदातु परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) पहले ही केंद्रीय जल आयोग को सौंपी जा चुकी है और आयोग के विभिन्न विभाग उसकी जाँच कर रहे हैं। गौरतलब है कि 18 जून 2026 तक जून माह में 2.068 टीएमसी जल का प्रवाह दर्ज किया गया है, जो नियमित जल प्रबंधन की निरंतरता को दर्शाता है।
तमिलनाडु से संवाद का प्रस्ताव
कर्नाटक सरकार ने संघीय ढाँचे का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक राज्य को अपने हितों की रक्षा का अधिकार है। हालाँकि, सरकार ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में मामला स्पष्ट हो जाने के बाद तमिलनाडु की ओर से लगातार आपत्तियाँ उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने संवाद का रास्ता खुला रखते हुए कहा कि यदि तमिलनाडु द्विपक्षीय वार्ता के लिए आगे आता है, तो मेकेदातु समेत लंबे समय से लंबित मुद्दों के समाधान के लिए बातचीत की जाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब दोनों राज्यों के बीच कावेरी जल विवाद दशकों से अनसुलझा बना हुआ है।
आगे की राह
केंद्रीय जल आयोग की समीक्षा पूरी होने और केंद्र सरकार की स्वीकृति मिलने के बाद ही परियोजना निर्माण की दिशा में अगला कदम उठाया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों राज्यों के बीच सीधी द्विपक्षीय बातचीत इस दीर्घकालिक जल विवाद को कानूनी अड़चनों से परे ले जाने का सबसे व्यावहारिक मार्ग हो सकती है।