खेत में मजदूरी, बिना कोचिंग मोबाइल से पढ़ाई — लक्ष्मी बनारा ने नीट 2025 क्वालीफाई किया
सारांश
मुख्य बातें
ओडिशा के एक छोटे से गाँव की छात्रा लक्ष्मी बनारा ने बिना किसी कोचिंग संस्थान की मदद और केवल मोबाइल फोन के ज़रिए पढ़ाई करते हुए नीट (NEET) परीक्षा 2025 उत्तीर्ण की है। उनकी यह उपलब्धि इसलिए और भी उल्लेखनीय है क्योंकि वे और उनका पूरा परिवार जीविका के लिए खेतों में दैनिक मज़दूरी पर निर्भर हैं।
संघर्ष की कहानी
लक्ष्मी ने बताया कि कॉलेज की छुट्टियों में जब वे घर लौटती हैं, तब भी परिवार की आर्थिक मदद के लिए खेतों में काम करती हैं। उन्होंने कहा, 'मैं एक गाँव से हूँ और मैंने नीट क्वालिफाई किया है। गुजारा करने के लिए मैं और मेरा परिवार रोज़ सुबह खेतों में काम करते हैं।' यह ऐसे समय में आया है जब देश में लाखों छात्र महँगी कोचिंग पर निर्भर हैं और ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए समान अवसर एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
परीक्षा की तैयारी और प्रदर्शन
लक्ष्मी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने परीक्षा की तैयारी के लिए कोई पेड सब्सक्रिप्शन तक नहीं लिया — केवल मोबाइल फोन पर उपलब्ध निःशुल्क सामग्री से अध्ययन किया। उनके अनुसार, बायोलॉजी उनका पसंदीदा और सबसे मज़बूत विषय रहा, जबकि फिज़िक्स सबसे कठिन लगी और केमिस्ट्री औसत रही। इस कारण उनकी ऑल इंडिया रैंक लगभग 9 लाख रही, जो उनकी अपेक्षा से कम थी — फिर भी उन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण की।
सरकारी कॉलेज न मिले तो भी नहीं रुकेंगी
लक्ष्मी का संकल्प दृढ़ है। उन्होंने कहा, 'अगर मुझे सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं भी मिलता है, तो भी मैं प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाई करके डॉक्टर बनूंगी।' उनका लक्ष्य एक अच्छी डॉक्टर बनकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएँ देना है, ताकि लोगों को स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
परिवार की प्रतिक्रिया
लक्ष्मी के मामा सुदाम हेम्ब्रम ने बताया कि उनका परिवार खेती-बाड़ी से जीवनयापन करता है और वे अत्यंत निर्धन पृष्ठभूमि से आते हैं। उन्होंने कहा, 'हम उसके रिज़ल्ट से बहुत खुश हैं। हमारे गाँव के सभी बच्चे काफी प्रतिभाशाली हैं।' गौरतलब है कि आर्थिक विपन्नता के बावजूद लक्ष्मी ने जो मुकाम हासिल किया है, वह उनके गाँव के लिए एक प्रेरणा बन गई है।
आगे की राह
लक्ष्मी ने भरोसा जताया कि वे आने वाले समय में अपनी मेहनत और लगन से जीवन में बेहतर मुकाम हासिल करेंगी। उनका मानना है कि यदि उन्होंने कोचिंग ली होती, तो अंक और बेहतर होते — लेकिन संसाधनों की कमी उनके हौसले को नहीं तोड़ पाई। उनकी यह यात्रा उन लाखों ग्रामीण छात्रों के लिए उम्मीद की किरण है जो सीमित साधनों में बड़े सपने पालते हैं।