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लालबागचा राजा 2026: मोदक से सोने के मुकुट तक — जानिए किस भोग से पूरी होती है मन्नत

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लालबागचा राजा 2026: मोदक से सोने के मुकुट तक — जानिए किस भोग से पूरी होती है मन्नत

सारांश

मुंबई का लालबागचा राजा महज़ एक गणेश पंडाल नहीं — यह 1934 से चली आ रही एक जीवंत आस्था है। मोदक, दूर्वा और सोने के मुकुट तक — हर चढ़ावे के पीछे एक मन्नत और एक कहानी है। इस साल महाकालेश्वर थीम और अमेरिकी राजदूत की उपस्थिति ने इसे और खास बना दिया।

मुख्य बातें

लालबागचा राजा , मुंबई के लालबाग (परेल) में स्थित, गणेश चतुर्थी का सबसे प्रसिद्ध सार्वजनिक गणेश दरबार है और इसे 'नवसाचा गणपति' कहा जाता है।
पूजन में मोदक, दूर्वा, सिंदूर, नारियल, फूलों की माला, अक्षत और फल प्रमुख रूप से चढ़ाए जाते हैं।
मन्नत पूरी होने पर भक्त सोने की चेन, अंगूठी, मुकुट और चांदी की धार्मिक वस्तुएँ अर्पित करते हैं।
लालबागचा राजा की स्थापना 12 सितंबर 1934 को हुई थी; 1932 में बाजार बंद होने पर कोली समुदाय की मन्नत पूरी होने के बाद।
1935 से कांबली परिवार (मधुसूदन कांबली एवं उनकी पीढ़ियाँ) प्रतिमा को निरंतर आकार दे रहे हैं।
इस वर्ष पंडाल महाकालेश्वर मंदिर थीम पर सजाया गया है; अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी दर्शन को पहुँचे।

मुंबई के लालबाग (परेल) इलाके में स्थित लालबागचा राजा गणेश चतुर्थी के दस दिवसीय महोत्सव का सबसे भव्य और ऐतिहासिक सार्वजनिक गणेश दरबार है, जहाँ भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी से लाखों श्रद्धालु बप्पा के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। इस वर्ष पंडाल को महाकालेश्वर मंदिर की भव्य थीम पर सजाया गया है और प्रतिदिन लाखों भक्त दर्शन की कतारों में खड़े नज़र आ रहे हैं। नवसाचा गणपति — अर्थात् भक्तों की मन्नत पूरी करने वाला — के नाम से प्रसिद्ध इस दरबार में चढ़ावे की हर परंपरा का गहरा धार्मिक महत्व है।

पूजन में चढ़ाई जाने वाली प्रमुख सामग्री

सोमवार को लालबागचा राजा की प्रतिमा स्थापित होने के बाद पूजन में दूर्वा, फूल, सिंदूर, मोदक, फल, नारियल, अक्षत और मिठाई अर्पित की गई। भगवान गणेश को मोदक अत्यंत प्रिय माना जाता है — मान्यता है कि मोदक का भोग लगाने से सुख-समृद्धि और मनोकामनाएँ शीघ्र पूरी होती हैं। इसके साथ ही फूलों की माला और अन्य पारंपरिक पूजन सामग्री भी अर्पित की जाती है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान को चढ़ावे का महत्व उसकी कीमत में नहीं बल्कि भक्त की श्रद्धा और भावना में निहित होता है। इसीलिए छोटे से नारियल से लेकर सोने के आभूषण तक — हर अर्पण समान आदर का प्रतीक है।

सोने-चांदी के चढ़ावे की परंपरा

लालबागचा राजा के दरबार में मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार सोने की चेन, अंगूठी, हार और मुकुट अर्पित करते हैं। चांदी की धार्मिक वस्तुएँ, गणेश प्रतिमाएँ और नगदी भी चढ़ावे में शामिल होती हैं। उल्लेखनीय है कि हर साल चढ़ाई जाने वाली वस्तुओं की संख्या और प्रकार अलग-अलग होती है।

भक्त संतान प्राप्ति, स्वास्थ्य लाभ, व्यापार में सफलता और परिवार की खुशहाली जैसी मनोकामनाओं के लिए बप्पा के दरबार में आते हैं। मन्नत पूरी होने पर वे फिर लौटकर कीमती भेंट अर्पित करते हैं — यह चक्र पीढ़ियों से चला आ रहा है।

लालबागचा राजा का ऐतिहासिक महत्व

लालबागचा राजा की स्थापना 12 सितंबर 1934 को हुई थी। इसके पीछे एक रोचक इतिहास है — 1932 में पेरू चाल का स्थानीय बाजार बंद हो जाने के बाद वहाँ के दुकानदारों और कोली (मछुआरा) समुदाय ने भगवान गणेश से स्थायी बाजार मिलने की मन्नत माँगी थी। मन्नत पूरी होने पर इन्हीं लोगों ने पहली बार यहाँ गणपति प्रतिमा स्थापित की।

तब से वर्ष 1935 से कांबली परिवार — जिनमें मधुसूदन कांबली और उनकी आगामी पीढ़ियाँ शामिल हैं — इस प्रसिद्ध प्रतिमा को निरंतर आकार देते आ रहे हैं। यह नौ दशकों से अधिक पुरानी परंपरा मुंबई की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

इस साल की विशेषताएँ

इस वर्ष के पंडाल को महाकालेश्वर मंदिर (उज्जैन) की थीम पर भव्य रूप से सजाया गया है, जो भक्तों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर सहित कई प्रसिद्ध हस्तियाँ बप्पा का आशीर्वाद लेने पंडाल पहुँची हैं।

प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि लालबागचा राजा की आस्था न केवल मुंबई, बल्कि पूरे देश और विदेश तक फैली हुई है। दस दिनों के बाद अनंत चतुर्दशी पर भव्य विसर्जन के साथ यह महोत्सव संपन्न होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि मुंबई की सामाजिक एकता की भी है — 1932 में बेरोज़गार दुकानदारों और कोली मछुआरों की साझा मन्नत ने एक ऐसी परंपरा को जन्म दिया जो आज नौ दशक बाद अमेरिकी राजदूतों को भी खींच लाती है। यह उल्लेखनीय है कि एक स्थानीय बाजार की तकलीफ से उपजी आस्था किस प्रकार वैश्विक आकर्षण बन गई। हालाँकि हर साल लाखों भक्तों की भीड़ और करोड़ों रुपये के चढ़ावे के बाद भी, इस परंपरा का सबसे मज़बूत पहलू यह है कि यह अमीर-गरीब में भेद नहीं करती — एक नारियल और एक सोने के मुकुट को समान भाव से स्वीकार किया जाता है।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लालबागचा राजा को 'नवसाचा गणपति' क्यों कहते हैं?
लालबागचा राजा को 'नवसाचा गणपति' इसलिए कहा जाता है क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार यहाँ आकर माँगी गई हर मन्नत पूरी होती है। यह नाम 1934 में कोली समुदाय की मन्नत पूरी होने की घटना से जुड़ा है, जब बाजार बंद होने पर उन्होंने गणेशजी से स्थायी बाजार माँगा था और मन्नत पूरी हुई थी।
लालबागचा राजा को किस चीज़ का भोग लगाया जाता है?
लालबागचा राजा को मुख्य रूप से मोदक, दूर्वा, सिंदूर, नारियल, फूलों की माला, अक्षत, फल और मिठाई चढ़ाई जाती है। भगवान गणेश को मोदक विशेष रूप से प्रिय माना जाता है, इसलिए यह भोग का सबसे अहम हिस्सा है।
मन्नत पूरी होने पर भक्त क्या अर्पित करते हैं?
मन्नत पूरी होने पर भक्त अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार सोने की चेन, अंगूठी, हार, मुकुट या चांदी की धार्मिक वस्तुएँ अर्पित करते हैं। कुछ भक्त मोदक, नारियल और पारंपरिक पूजन सामग्री चढ़ाकर भी अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
लालबागचा राजा की स्थापना कब और कैसे हुई?
लालबागचा राजा की स्थापना 12 सितंबर 1934 को हुई थी। 1932 में पेरू चाल का बाजार बंद होने के बाद वहाँ के दुकानदारों और कोली समुदाय ने गणेशजी से स्थायी बाजार मिलने की मन्नत माँगी, और मन्नत पूरी होने पर पहली बार गणपति प्रतिमा स्थापित की गई।
लालबागचा राजा की प्रतिमा कौन बनाता है?
1935 से कांबली परिवार — जिनमें मधुसूदन कांबली और उनकी आगामी पीढ़ियाँ शामिल हैं — लगातार इस प्रसिद्ध प्रतिमा को आकार देते आ रहे हैं। यह परंपरा नौ दशकों से भी अधिक समय से अनवरत जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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