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लाठीपहाड़ गांव को 75 साल बाद मिली पक्की सड़क, PM जनमन योजना से बदली दुमका के आदिवासी गांव की तस्वीर

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लाठीपहाड़ गांव को 75 साल बाद मिली पक्की सड़क, PM जनमन योजना से बदली दुमका के आदिवासी गांव की तस्वीर

सारांश

75 साल की उपेक्षा के बाद दुमका का लाठीपहाड़ गांव — जिसने 1942 में अंग्रेजों से लोहा लिया था — अब PM जनमन योजना की ₹1.98 करोड़ की सड़क से जुड़ा है। 2.40 किमी की यह पक्की सड़क उन ग्रामीणों के लिए जीवन रेखा है जो कभी मरीजों को खाट पर 12 किमी ढोते थे।

मुख्य बातें

लाठीपहाड़ गांव , दुमका , झारखंड को स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद पहली पक्की सड़क मिली।
प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत ₹1.98 करोड़ की लागत से 2.40 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण किया गया।
सांसद नलिन सोरेन ने शिलान्यास किया; निर्माण लगभग एक वर्ष में पूरा हुआ।
पहले मरीजों को खाट पर 12 किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ता था; न एम्बुलेंस पहुंच पाती थी।
गांव ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था, फिर भी दशकों तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा।
ग्रामीणों ने आसपास के अन्य दुर्गम गांवों तक भी सड़क सुविधा विस्तार की मांग की है।

झारखंड के दुमका जिले में स्थित लाठीपहाड़ गांव को स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद अंततः पक्की सड़क नसीब हुई है। प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत ₹1.98 करोड़ की लागत से निर्मित 2.40 किलोमीटर लंबी यह सड़क दुमका मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों के बीच बसे इस गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ रही है। दशकों की उपेक्षा के बाद यह सड़क ग्रामीणों के लिए नई उम्मीद का प्रतीक बन गई है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उपेक्षा की दास्तान

लाठीपहाड़ का इतिहास गौरवशाली रहा है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में इस गांव के निवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई थी। बावजूद इसके, स्वतंत्रता के बाद के दशकों में यह गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा। यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड के दूरदराज के आदिवासी बहुल इलाकों में बुनियादी ढाँचे की कमी एक पुरानी और गहरी समस्या रही है।

गांव तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता दुर्गम पहाड़ी पगडंडियाँ थीं। बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए करीब 12 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। ग्रामीणों को अपनी कृषि उपज बाज़ार तक पहुंचाने में भारी कठिनाई होती थी और रोज़गार के अवसर बेहद सीमित थे।

स्वास्थ्य संकट: खाट पर मीलों का सफर

स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक थी। गांव में किसी के बीमार पड़ने पर मरीज को खाट पर लादकर 12 किलोमीटर तक पैदल ले जाना पड़ता था। गर्भवती महिलाओं और गंभीर रोगियों को अस्पताल पहुंचाना जानलेवा चुनौती था, क्योंकि न एम्बुलेंस पहुंच पाती थी और न कोई अन्य वाहन। गांव की महिलाओं और युवतियों को भी आवागमन की इन कठिनाइयों के कारण अनेक सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

सड़क निर्माण: चुनौतियाँ और उपलब्धि

वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत बस्का से लाठीपहाड़ तक सड़क निर्माण को स्वीकृति मिली। दुमका के सांसद नलिन सोरेन ने इस परियोजना का शिलान्यास किया और लगभग एक वर्ष के भीतर निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया। सहायक अभियंता सुधांशु कुमार ने बताया कि पहाड़ी भूभाग होने के कारण निर्माण में अनेक बाधाएं आईं, लेकिन सभी को पार करते हुए सड़क तैयार की गई। कार्यपालक अभियंता सुशील कुमार सिन्हा के अनुसार, इस सड़क से ग्रामीणों को बेहतर आवागमन सुविधा मिलेगी और विकास की नई संभावनाएं खुलेंगी।

ग्रामीणों की आवाज़: बदलाव की उम्मीद

ग्राम प्रधान लगन गृही ने कहा कि सड़क बनने से पहले आने-जाने में भारी परेशानी होती थी, लेकिन अब बच्चों की पढ़ाई आसान हो गई है और ग्रामीणों का आवागमन सुगम हो गया है। ग्रामीण विष्णु गृही ने भी सड़क निर्माण को गांव के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया और कहा कि पहले मरीजों को अस्पताल ले जाना बेहद कठिन था, अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।

ग्रामीणों ने अब आसपास के अन्य दुर्गम गांवों तक भी सड़क सुविधा पहुंचाने की मांग की है। यह सड़क केवल एक मार्ग नहीं, बल्कि लाठीपहाड़ के लिए नई जिंदगी का द्वार बन गई है — और यह सवाल भी उठाती है कि ऐसे दर्जनों गांव अभी भी इसी प्रतीक्षा में हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन विकास की दौड़ में सबसे पीछे छूट गए — यह विडंबना गहरी है। PM जनमन योजना एक सकारात्मक कदम है, पर असली सवाल यह है कि इस एक सड़क के बाद स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल और रोज़गार के अवसर कब पहुंचेंगे। केवल सड़क से कनेक्टिविटी मिलती है, समृद्धि नहीं — उसके लिए बहु-आयामी निवेश चाहिए। ऐसे गांवों की वास्तविक तकदीर बदलेगी तभी, जब सड़क के साथ-साथ सेवाएं भी पहुंचें।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लाठीपहाड़ गांव में सड़क किस योजना के तहत बनी?
यह सड़क प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत बनी है। वर्ष 2025 में बस्का से लाठीपहाड़ तक 2.40 किलोमीटर लंबी सड़क को ₹1.98 करोड़ की लागत से स्वीकृति मिली और लगभग एक वर्ष में निर्माण पूरा हुआ।
लाठीपहाड़ गांव कहां स्थित है और यहां सड़क क्यों नहीं थी?
लाठीपहाड़ गांव झारखंड के दुमका जिले में मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच स्थित है। पहाड़ी और दुर्गम भूभाग के कारण यहां दशकों तक सड़क निर्माण नहीं हो सका और गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा।
सड़क न होने से लाठीपहाड़ के ग्रामीणों को क्या-क्या कठिनाइयां होती थीं?
सड़क के अभाव में ग्रामीणों को मरीजों को खाट पर लादकर 12 किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ता था। बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर 12 किलोमीटर पैदल चलना होता था और कृषि उपज बाज़ार तक पहुंचाना भी मुश्किल था।
इस सड़क परियोजना का शिलान्यास किसने किया?
दुमका के सांसद नलिन सोरेन ने इस परियोजना का शिलान्यास किया था। स्वीकृति के लगभग एक वर्ष के भीतर निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया।
लाठीपहाड़ गांव का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
लाठीपहाड़ गांव के निवासियों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई थी। स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के बावजूद यह गांव आजादी के 75 वर्षों तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा।
राष्ट्र प्रेस
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