केरल चुनाव हार: 99 से 35 सीटों पर सिमटे एलडीएफ की आत्ममंथन बैठक अगले महीने
सारांश
मुख्य बातें
केरल विधानसभा चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) की करारी हार के तीन महीने बाद भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यह समझने में जुटी है कि आखिर कहाँ चूक हो गई। 140 सदस्यीय केरल विधानसभा में एलडीएफ की सीटें 99 से घटकर महज 35 रह गईं, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) ने सत्ता पर कब्जा किया। अगले महीने होने वाली सीपीआई(एम) की तीन दिवसीय राज्य समिति बैठक में इस हार की बारीकी से समीक्षा की जाएगी।
मुख्य घटनाक्रम
पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ इस विश्वास के साथ चुनावी मैदान में उतरा था कि इतिहास फिर से लिखा जाएगा और पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में आएगी। लेकिन मतदाताओं ने कहानी पलट दी। उल्लेखनीय है कि 2021 में पूरी तरह सफाया झेलने के बाद इस बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) तीन सीटों के साथ विधानसभा में वापसी करने में सफल रही।
अपनों से मिली चोट
सीपीआई(एम) को सबसे गहरी चोट अपने ही राजनीतिक परिदृश्य में मिली। पार्टी के तीन वरिष्ठ नेता अपनी सीटें इसलिए बचा सके क्योंकि यूडीएफ ने उनके खिलाफ उम्मीदवार न उतारने का रणनीतिक फैसला किया था। इनमें से दो जीतें कन्नूर जिले से आईं — जो विजयन का अपना राजनीतिक गढ़ माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह संकेत देता है कि पार्टी का परंपरागत किला भी अब उतना अभेद्य नहीं रहा।
विजयन की भूमिका पर सवाल
पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने यह स्पष्ट किया है कि आगामी समीक्षा बैठक में विजयन के नेतृत्व को भी दायरे से बाहर नहीं रखा जाएगा। वर्षों तक पार्टी के भीतर विजयन की आलोचना को लगभग वर्जित माना जाता था। आलोचकों का कहना है कि अब पहली बार उनके कार्यकाल और फैसलों पर खुलकर चर्चा की संभावना बन रही है।
विजयन खेमे की रणनीति
हार के बावजूद विजयन का खेमा निष्क्रिय नहीं बैठा है। उनका सोशल मीडिया तंत्र सक्रिय रूप से नई वीडी सतीशन सरकार के हर कदम की आलोचना कर रहा है। बाढ़ राहत, प्रशासनिक चूक और अन्य मुद्दों पर यह भावना फैलाई जा रही है कि 'काश विजयन अभी भी सत्ता में होते।' यह रणनीति पार्टी के भीतर विजयन की प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।
क्या होगा आगे
अगले महीने होने वाली सीपीआई(एम) राज्य समिति की तीन दिवसीय बैठक में चुनावी पराजय के हर पहलू की पड़ताल होगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस समीक्षा में विजयन के नेतृत्व का भी निष्पक्ष मूल्यांकन होगा, या पार्टी की आंतरिक राजनीति इसे सीमित कर देगी। इस बैठक के नतीजे केरल में वाम राजनीति की अगली दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।