क्या लेफ्टिनेंट राजीव संधू ने दुश्मनों के छुड़ा दिए थे छक्के?

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क्या लेफ्टिनेंट राजीव संधू ने दुश्मनों के छुड़ा दिए थे छक्के?

सारांश

लेफ्टिनेंट राजीव संधू की कहानी एक अद्वितीय साहस और बलिदान की है। 21 वर्ष की आयु में, उन्होंने दुश्मनों के खिलाफ बेधड़क होकर लड़ाई लड़ी और महावीर चक्र से सम्मानित किए गए। जानिए उनकी वीरता की कहानी।

Key Takeaways

  • समर्पण और सेवा का महत्व
  • साहस का अद्वितीय उदाहरण
  • महावीर चक्र से सम्मानित होना
  • युवा सैनिकों की वीरता
  • देश की रक्षा में बलिदान

नई दिल्ली, 11 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। राजीव संधू, जो 12 नवंबर 1966 को जन्मे थे, अपने माता-पिता (देविंदर सिंह संधू और जय कांता संधू) के इकलौते संतान थे। अमृतसर से जुड़ा यह परिवार चंडीगढ़ के सेक्टर 45 में निवास करता था। उनके घर में देशभक्ति कोई नारा नहीं, बल्कि एक विरासत थी। उनके दादाजी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में सेवा की थी और उनके पिता भारतीय वायु सेना में कार्यरत थे। इस प्रकार, राजीव को बचपन से ही समर्पण और सेवा का पाठ मिला।

राजीव ने चंडीगढ़ के सेंट जॉन हाई स्कूल और पंजाब विश्वविद्यालय से संबंधित डीएवी कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। वह केवल एक मेधावी छात्र नहीं थे, बल्कि एक अद्भुत एथलीट भी थे। उन्होंने लगातार सात वर्षों तक राष्ट्रीय रोलर स्केटिंग चैंपियनशिप का खिताब जीता। रोलर स्केटिंग की तेज रफ्तार और संतुलन की मांग करने वाले इस खेल ने उन्हें वह शारीरिक सहनशक्ति, मानसिक दृढ़ता और तुरंत प्रतिक्रिया की क्षमता दी, जो बाद में रणभूमि में निर्णायक साबित हुई।

अकादमी में चयन के बाद, राजीव ने चेन्नई स्थित अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (ओटीए) में प्रशिक्षण लिया। 5 मार्च 1988 को उन्हें सेकंड लेफ्टिनेंट राजीव संधू (एसएस-33343) के रूप में 7वीं बटालियन, द असम रेजिमेंट में कमीशन दिया गया। यह एक ऐसी सैन्य यात्रा की शुरुआत थी जो चार महीने और चौदह दिन में समाप्त हो गई।

कमीशन मिलते ही, उन्हें भारतीय शांति सेना के तहत ऑपरेशन पवन के लिए श्रीलंका में तैनात किया गया। गृहयुद्ध से जूझ रहे श्रीलंका के बट्टिकलोआ सेक्टर में तैनात उनकी बटालियन को तुरंत उग्रवादी गुट एलटीटीई के खिलाफ जवाबी कार्रवाई में लगाया गया। कुछ ही हफ्तों में, उन्हें 19 मद्रास रेजिमेंट की 'सी' कंपनी के साथ संलग्न कर दिया गया। राजीव ने सीधे युद्ध के माहौल में प्रवेश किया।

19 जुलाई 1988 का दिन। सेकंड लेफ्टिनेंट राजीव संधू को सूखी राशन सामग्री इकट्ठा करने के लिए मदुरंग केनी कुलम से मंगनी की ओर जाने वाले दो वाहनों के छोटे काफिले का नेतृत्व करने का काम सौंपा गया था।

जैसे ही उनका काफिला आगे बढ़ा, एलटीटीई के उग्रवादियों ने उन पर भीषण घात हमला कर दिया। स्वचलित हथियारों और खासकर, रॉकेटों से हमला इतना भयंकर था कि काफिला तुरंत रुक गया।

राजीव जीप से बाहर निकले, लेकिन तभी एक रॉकेट का निशाना उन पर लगा। विस्फोट और गोलियों ने उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया। चोट इतनी भयानक थी कि उनके दोनों पैर पूरी तरह क्षत-विक्षत हो गए थे और उनका शरीर गोलियों से छलनी था। कोई भी साधारण मनुष्य इस दर्द और सदमे के आगे हार मान लेता।

राजीव लहूलुहान होकर अपनी जीप से लुढ़क गए। एलटीटीई के उग्रवादियों ने यह मान लिया कि जीप में सवार सभी सैनिक मारे जा चुके हैं और वे अब सैन्य हथियारों और गोला-बारूद को लूटने के लिए अपने कवर से बाहर निकलने लगे।

यही वह निर्णायक क्षण था जिसने राजीव को इतिहास में अमर कर दिया।

उन्होंने अपनी 9 एमएम कार्बाइन को मजबूती से पकड़ा। अपने दोनों पैरों को खोने के बावजूद, उन्होंने सिर्फ अपनी इच्छाशक्ति के बल पर जमीन पर रेंगना शुरू किया। वह एक ऐसी जगह तक पहुंचे जहां से वह प्रभावी ढंग से जवाबी फायर कर सकें।

राजीव ने रेंगते हुए अपनी बंदूक उठाई और करीब आ रहे उग्रवादियों पर सटीक निशाना लगाना शुरू कर दिया। उनके अचानक और प्रभावी हमले ने उग्रवादियों को हक्का-बक्का कर दिया। वे हथियारों को छू भी नहीं पाए और उन्हें वापस भागना पड़ा।

अपने अंतिम क्षणों में, राजीव ने अपने सामने आए एक प्रमुख उग्रवादी को गोली मार दी। बाद में पता चला कि वह कराची के नेतृत्व वाले समूह का एक महत्वपूर्ण सेक्टर नेता कुमारन था। यह सिर्फ एक आत्मरक्षा का कार्य नहीं था, यह एक महत्वपूर्ण सामरिक जीत थी।

अपनी शारीरिक क्षमता की अंतिम सीमा तक लड़ने के बाद, सेकंड लेफ्टिनेंट राजीव संधू ने रणभूमि में दम तोड़ दिया। उन्हें तुरंत फील्ड एम्बुलेंस ले जाया गया, जहां उनका निधन हो गया।

राजीव संधू को उनके इस अद्वितीय और आत्म-बलिदानी कार्य के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके प्रशस्ति पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह किए बिना दुश्मन का सामना करने में अनुकरणीय साहस दिखाया और अपने साथियों के जीवन और हथियारों को सुरक्षित रखने के लिए अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया।

मृत्यु के समय, 19 जुलाई 1988 को, उनकी उम्र महज 21 वर्ष और 6 महीने थी और उनका सेवाकाल केवल सवा चार महीने का था। केवल सवा चार महीने के कमीशन के साथ, 21 वर्ष की आयु में, राजीव संधू ने भारतीय सेना के सबसे ऊंचे मानकों को स्थापित किया।

Point of View

जो हम सभी भारतीयों के लिए गर्व की बात है। उनका साहस और समर्पण हमें यह सिखाता है कि देश सेवा सबसे बड़ा कर्तव्य है।
NationPress
07/02/2026

Frequently Asked Questions

लेफ्टिनेंट राजीव संधू ने किस प्रकार की वीरता दिखाई?
लेफ्टिनेंट राजीव संधू ने दुश्मनों के खिलाफ अद्वितीय साहस दिखाया और अपने जीवन का बलिदान दिया।
राजीव संधू को कौन सा पुरस्कार मिला?
उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
उनकी उम्र मृत्यु के समय क्या थी?
उनकी उम्र मृत्यु के समय 21 वर्ष और 6 महीने थी।
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