झारखंड लॉकडाउन वृक्ष कटाई मामला: हाईकोर्ट ने चार साल बाद भी जांच अधूरी रहने पर सरकार को घेरा
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 30 जून 2026 को कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान राज्य के कई जिलों में कथित तौर पर हुई बड़े पैमाने पर अवैध वृक्ष कटाई की जांच की सुस्त रफ़्तार पर कड़ी नाराज़गी जताई। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि चार वर्ष बीत जाने के बाद भी सीआईडी की जांच किस चरण में है और इसे अब तक पूरा क्यों नहीं किया जा सका।
अदालत की मुख्य आपत्तियाँ
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान यह भी सवाल उठाया कि सीआईडी की जांच फ़िलहाल केवल पलामू जिले के पांकी क्षेत्र तक ही सीमित क्यों दिखती है। याचिका में जामताड़ा, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) और रांची सहित कई जिलों में सैकड़ों पेड़ों की अवैध कटाई का आरोप लगाया गया है। अदालत ने राज्य सरकार को इस संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ता के आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभय कुमार मिश्रा ने अदालत को बताया कि मामला सामने आने के बाद सरकार ने जांच सीआईडी को सौंपी थी, लेकिन वह बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि मामले में शामिल लोगों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। इस पर अदालत ने कथित 'लार्जर कंस्पिरेसी' के पहलू पर भी सरकार से विस्तृत जवाब माँगा है।
अब तक की जांच में क्या सामने आया
पूर्व की सुनवाई में राज्य सरकार ने स्वीकार किया था कि जांच के दौरान वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका सामने आई है। सरकार ने यह भी माना था कि दो वन अधिकारियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, जबकि एक अन्य आरोपी के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। पलामू जिले में दर्ज दो प्राथमिकियों की जांच सीआईडी के पास है।
आरोपों की पृष्ठभूमि
याचिका के अनुसार, वर्ष 2020 के कोविड लॉकडाउन के दौरान जब देश भर में आवाजाही पर सख्त पाबंदी थी, उसी समय झारखंड के कई जिलों में सैकड़ों पेड़ों की कथित अवैध कटाई की गई। आरोप है कि कटे हुए पेड़ों को 200 से अधिक ट्रकों के माध्यम से बाहर भेजा गया। यह ऐसे समय में हुआ जब प्रशासनिक निगरानी तंत्र महामारी प्रबंधन में व्यस्त था, जिससे कथित तौर पर अपराधियों को अवसर मिला।
आगे क्या होगा
हाईकोर्ट पूर्व की सुनवाइयों में भी जांच में देरी पर कड़ा रुख अपना चुका है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि केवल दस्तावेजों की माँग का हवाला देकर देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित है, जब राज्य सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा।