28 अक्टूबर 2026
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मध्य प्रदेश नगरीय निकाय भ्रष्टाचार: माकपा का आरोप — BJP को राजनेताओं की 'सामाजिक प्रतिष्ठा' की चिंता, सरकार खामोश

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मध्य प्रदेश नगरीय निकाय भ्रष्टाचार: माकपा का आरोप — BJP को राजनेताओं की 'सामाजिक प्रतिष्ठा' की चिंता, सरकार खामोश

सारांश

मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों के भ्रष्टाचार पर माकपा ने BJP को सीधे घेरा है। ₹5 की फिनाइल ₹33,000 में खरीदने जैसे आँकड़े सामने आने के बाद पार्टी ने पूछा — ₹11,000 करोड़ की खरीद में महज ₹250 करोड़ का घोटाला कैसे? और 139 दोषियों के नाम 'सामाजिक सम्मान' के नाम पर क्यों छुपाए जा रहे हैं?

मुख्य बातें

माकपा राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश नगरीय निकाय भ्रष्टाचार में BJP नेताओं और मंत्रियों का राजनीतिक संरक्षण कथित तौर पर शामिल है।
ACS रैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी का खरीद घोटाले से संबंधित वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद सरकार ने कई अधिकारियों पर कार्रवाई की।
सरकार ने स्वीकार किया कि 139 लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई, लेकिन 'सामाजिक सम्मान' का हवाला देते हुए नाम उजागर करने से इनकार किया।
माकपा ने ₹250 करोड़ की घोषित भ्रष्टाचार राशि पर संदेह जताया — ₹5 की फिनाइल ₹33,000 , ₹350 की LED ₹11,500 और ₹2 लाख की कचरा गाड़ी ₹6 लाख में खरीदने के आँकड़े सामने आए।
कुल ₹11,000 करोड़ की खरीद में केवल ₹250 करोड़ का भ्रष्टाचार माकपा को तर्कसंगत नहीं लगता।
माकपा की माँग — सभी साक्ष्य और दोषियों के नाम सार्वजनिक किए जाएँ।

मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों की खरीद प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को लेकर राज्य की सियासत गरमाई हुई है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने 28 अक्टूबर 2026 को आरोप लगाया कि इस घोटाले की जड़ें सिर्फ नौकरशाही तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेताओं और मंत्रियों का भी राजनीतिक संरक्षण कथित तौर पर शामिल है। पार्टी ने सभी दोषियों के नाम सार्वजनिक करने की माँग की है।

विवाद की पृष्ठभूमि

मामले की शुरुआत तब हुई जब अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) रैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नगरीय निकायों के अधिकारियों के एक कार्यक्रम में खरीद प्रक्रिया में हो रहे भ्रष्टाचार के आँकड़े सार्वजनिक रूप से गिनाए। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो गया, जिसके बाद सरकार ने कई अधिकारियों पर कार्रवाई शुरू की। माकपा के अनुसार, यह वीडियो BJP की आंतरिक प्रतिद्वंदिता के कारण लीक हुआ था।

माकपा के प्रमुख आरोप

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने एक बयान में कहा कि वही अधिकारी जिसने कभी चेतावनी दी थी कि अगले साल से ऐसा हुआ तो माफ नहीं किया जाएगा, अब कह रहा है कि 139 लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की गई है — लेकिन उनके 'सामाजिक सम्मान' के कारण उनके नाम उजागर नहीं किए जा सकते। सिंह के अनुसार, यह रवैया साफ तौर पर दर्शाता है कि सरकार मामले को दबाने की कोशिश कर रही है।

माकपा नेता ने कटाक्ष करते हुए कहा कि जो सरकार बिजली बिल देर से जमा करने पर सभ्य नागरिकों के घरों पर नोटिस चस्पा करती है, कुर्की करती है और मामूली अपराधों में गरीबों के घर पर बुलडोजर चलाती है — उसे भ्रष्टाचारियों की 'सामाजिक प्रतिष्ठा' की चिंता सता रही है। उन्होंने कहा, 'इससे साफ हो जाता है कि BJP की सरकार किसकी सरकार है।'

भ्रष्टाचार की राशि पर सवाल

माकपा ने भ्रष्टाचार की घोषित राशि ₹250 करोड़ पर भी संदेह जताया है। पार्टी के अनुसार यदि ₹5 की फिनाइल ₹33,000 में, ₹350 की LED ₹11,500 में और ₹2 लाख की कचरा गाड़ी ₹6 लाख में खरीदी गई है, तो ₹11,000 करोड़ की कुल खरीद में केवल ₹250 करोड़ का भ्रष्टाचार तर्कसंगत नहीं लगता। पार्टी का कहना है कि वास्तविक घोटाला इससे कहीं अधिक हो सकता है।

सरकार की चुप्पी पर सवाल

माकपा ने इस मामले पर मुख्यमंत्री, संबंधित मंत्री और पूरी BJP की चुप्पी को भी संदेहास्पद बताया है। जसविंदर सिंह का आरोप है कि सत्ता पक्ष इसलिए चुप है क्योंकि भ्रष्टाचार की इस 'गंगा' में नौकरशाही के साथ-साथ BJP नेताओं और मंत्रियों ने भी 'डुबकी लगाई है।' हालाँकि, इन आरोपों पर BJP या राज्य सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

माकपा की माँगें और आगे की राह

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने माँग की है कि भ्रष्टाचार के सभी साक्ष्य सार्वजनिक किए जाएँ और जिन 139 लोगों के विरुद्ध कार्रवाई हुई है, उनके नाम भी आम जनता के सामने लाए जाएँ। यह ऐसे समय में सामने आया है जब मध्य प्रदेश में स्थानीय निकाय प्रशासन की जवाबदेही पहले से ही सवालों के घेरे में है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस दबाव के बीच पारदर्शिता की दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इस बार की परिस्थिति असाधारण है — आरोप खुद सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के वायरल बयान से उपजे हैं, विपक्ष के किसी दावे से नहीं। '139 दोषियों के नाम उनके सामाजिक सम्मान के कारण नहीं बताए जा सकते' — यह तर्क कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को सीधे चुनौती देता है और जवाबदेही की पूरी अवधारणा को कमज़ोर करता है। ₹11,000 करोड़ की खरीद में केवल ₹250 करोड़ के भ्रष्टाचार का आँकड़ा तब और संदिग्ध हो जाता है जब खुद सरकारी दस्तावेज़ों में हज़ारों गुना मूल्य वृद्धि के उदाहरण सामने हों। मुख्यधारा की कवरेज इसे महज विपक्षी बयानबाजी की तरह पेश कर रही है — असली सवाल यह है कि क्या यह जाँच स्वतंत्र एजेंसी से होगी, या सरकार खुद अपनी जाँच करती रहेगी।
RashtraPress
28 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मध्य प्रदेश नगरीय निकाय भ्रष्टाचार विवाद क्या है?
मध्य प्रदेश में ACS रैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नगरीय निकायों की खरीद प्रक्रिया में हो रहे भ्रष्टाचार के आँकड़े सार्वजनिक रूप से गिनाए, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद सरकार ने कई अधिकारियों पर कार्रवाई की और माकपा सहित विपक्ष ने BJP पर राजनीतिक संरक्षण का आरोप लगाया।
माकपा ने ₹250 करोड़ के भ्रष्टाचार के आँकड़े पर सवाल क्यों उठाए?
माकपा का तर्क है कि यदि ₹5 की फिनाइल ₹33,000 में, ₹350 की LED ₹11,500 में और ₹2 लाख की कचरा गाड़ी ₹6 लाख में खरीदी गई है, तो ₹11,000 करोड़ की कुल खरीद में केवल ₹250 करोड़ का भ्रष्टाचार तर्कसंगत नहीं है। पार्टी का मानना है कि वास्तविक घोटाला घोषित राशि से कहीं अधिक हो सकता है।
सरकार ने 139 दोषियों के नाम क्यों नहीं बताए?
सरकार की ओर से कहा गया है कि कार्रवाई किए गए 139 लोगों के 'सामाजिक सम्मान' के कारण उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते। माकपा ने इस तर्क को पारदर्शिता के विरुद्ध बताते हुए माँग की है कि सभी दोषियों की पहचान उजागर की जाए।
माकपा की इस मामले में क्या माँगें हैं?
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने माँग की है कि भ्रष्टाचार के सभी साक्ष्य सार्वजनिक किए जाएँ और जिन 139 लोगों के विरुद्ध कार्रवाई हुई है, उनके नाम भी आम जनता के सामने लाए जाएँ। पार्टी यह भी चाहती है कि यह स्पष्ट किया जाए कि क्या BJP नेताओं और मंत्रियों की संलिप्तता की भी जाँच हो रही है।
यह विवाद BJP के लिए राजनीतिक रूप से क्यों संवेदनशील है?
यह वीडियो कथित तौर पर BJP की आंतरिक प्रतिद्वंदिता के कारण लीक हुआ था, जो पार्टी के भीतर दरार का संकेत देता है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्रियों की चुप्पी को माकपा ने राजनीतिक संरक्षण का प्रमाण बताया है, जिससे सरकार पर पारदर्शिता का दबाव और बढ़ गया है।
राष्ट्र प्रेस
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