13 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

महंत अवैद्यनाथ जयंती: धर्म, समाजसेवा और राष्ट्रचेतना के अप्रतिम संगम का स्मरण

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
महंत अवैद्यनाथ जयंती: धर्म, समाजसेवा और राष्ट्रचेतना के अप्रतिम संगम का स्मरण

सारांश

महंत अवैद्यनाथ सिर्फ एक संत नहीं, एक वैचारिक युग थे। गोरक्षपीठ की पीठाधीश्वरी से लेकर राम जन्मभूमि आंदोलन के नेतृत्व तक, उन्होंने धर्म को समाज और राष्ट्र की सेवा का माध्यम बनाया — और योगी आदित्यनाथ के रूप में वह विरासत आज भी जीवंत है।

मुख्य बातें

महंत अवैद्यनाथ का जन्म 28 मई 1921 को पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड के कांड़ी गाँव में हुआ था।
8 फरवरी 1942 को 23 वर्ष की आयु में महंत दिग्विजयनाथ ने उन्हें उत्तराधिकारी घोषित किया; 1969 में वे गोरक्षपीठ के पूर्ण पीठाधीश्वर बने।
1962 से 1977 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा में और 1970 , 1989 , 1991 , 1996 में गोरखपुर लोकसभा सीट से सांसद रहे।
1984 में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष बने और राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख स्तंभ रहे।
1998 में योगी आदित्यनाथ को उत्तराधिकारी घोषित किया; योगी उसी वर्ष देश के सबसे युवा सांसद बने।
12 सितंबर 2014 को गोरखपुर में ब्रह्मलीन; नाथ परंपरा के अनुसार पद्मासन मुद्रा में समाधि दी गई।

गोरक्षपीठ के ब्रह्मलीन पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ जी महाराज भारत की उन विरल विभूतियों में से थे, जिन्होंने अध्यात्म को समाज-सुधार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धुरी बनाया। 28 मई 1921 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कांड़ी गाँव में कृपाल सिंह बिष्ट के रूप में जन्मे इस महापुरुष की जीवन-यात्रा हिमालय की तलहटी से आरंभ होकर पूरे देश की हिंदू चेतना को झकझोरने तक फैली रही। 12 सितंबर 2014 को गोरखपुर में उनके ब्रह्मलीन होने के बाद भी उनकी वैचारिक विरासत गोरक्षपीठ की परंपरा में जीवंत है।

गुरु-परंपरा और दीक्षा का प्रारंभ

बचपन में ही माता-पिता का निधन हो जाने के कारण कृपाल सिंह बिष्ट का मन अध्यात्म की ओर उन्मुख हुआ। युवावस्था में उन्होंने हिमालय, कैलाश मानसरोवर, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थस्थलों की यात्राएँ कीं। 1940 में बंगाल प्रवास के दौरान उनकी भेंट गोरखनाथ मठ के तत्कालीन पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज से हुई, जो उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।

8 फरवरी 1942 को मात्र 23 वर्ष की आयु में दिग्विजयनाथ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और 'अवैद्यनाथ' नाम दिया। 1969 में गुरुदेव के ब्रह्मलीन होने के पश्चात वे गोरक्षपीठ के पूर्ण पीठाधीश्वर बने। गौरतलब है कि दिग्विजयनाथ ने 1939 में अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा की स्थापना कर साधु-संतों को सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित किया था — यही वैचारिक बीज आगे चलकर महंत अवैद्यनाथ के व्यक्तित्व में पल्लवित हुआ।

सामाजिक समरसता का अभियान

महंत अवैद्यनाथ का दृढ़ मत था कि धर्म केवल पूजा-अर्चना का विषय नहीं, बल्कि समाज को संगठित और जागृत करने का सशक्त माध्यम है। हिंदू समाज में व्याप्त छुआछूत और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध उन्होंने सक्रिय अभियान चलाया।

1980 के दशक में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में हरिजनों के सामूहिक धर्मांतरण की घटना ने उन्हें गहराई से आंदोलित किया। इसके बाद उन्होंने सामाजिक समरसता और हिंदू एकता को अपने जीवन का प्रमुख लक्ष्य बना लिया। उनका कहना था कि हिंदू समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता है और सबसे बड़ी कमज़ोरी उसका जातिगत विभाजन।

संसदीय जीवन और राजनीतिक प्रभाव

धर्म और समाज-सेवा के साथ-साथ महंत अवैद्यनाथ की राजनीतिक उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही। हिंदू महासभा के प्रत्याशी के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा की मानीराम सीट से 1962, 1967, 1974 और 1977 में विजय प्राप्त की।

इसके बाद 1970, 1989, 1991 और 1996 में वे गोरखपुर लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुए। कालांतर में उनका जुड़ाव भारतीय जनता पार्टी (BJP) से भी हुआ। उनकी राजनीति का मूल आधार हिंदुत्व, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था।

राम जन्मभूमि आंदोलन में भूमिका

1984 में महंत अवैद्यनाथ श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष बने और उन्होंने देशभर के विभिन्न अखाड़ों, संप्रदायों तथा धर्माचार्यों को एक मंच पर एकत्रित किया। 1990 के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब वे इस आंदोलन के प्रमुख स्तंभ बनकर उभरे।

1990 में कारसेवा के दौरान विवादित ढाँचे पर पूजा के आयोजन को उनके अडिग संकल्प का प्रतीक माना गया। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि राम मंदिर निर्माण तक वे विश्राम नहीं करेंगे। उनकी दृष्टि में यह आंदोलन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का संघर्ष था।

शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्तराधिकार की विरासत

महंत अवैद्यनाथ ने गोरखनाथ मठ को धार्मिक केंद्र के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा का बड़ा संस्थान बनाया। वे महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अध्यक्ष रहे और योगवाणी मासिक पत्रिका के संपादक के रूप में वैचारिक लेखन को दिशा दी। पूर्वांचल के गरीब और वंचित वर्गों तक शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँचाने में उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।

1998 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेते हुए योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। उसी वर्ष योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद चुने गए और उस समय देश के सबसे युवा सांसद बने। यह उत्तराधिकार केवल पीठ का हस्तांतरण नहीं था — यह दिग्विजयनाथ से अवैद्यनाथ और फिर योगी आदित्यनाथ तक चली आ रही गोरक्षपीठ की वैचारिक परंपरा का सुदृढ़ विस्तार था। उनकी यह विरासत आज भी भारतीय धर्म, राजनीति और समाज-सेवा के संगम पर जीवंत खड़ी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो उस दौर के अनेक धार्मिक नेताओं ने नहीं किया। तथापि, उनकी विरासत का मूल्यांकन करते समय यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राम मंदिर आंदोलन में उनकी भूमिका ने सामाजिक एकता को कितना जोड़ा और कितना विभाजित किया। गोरक्षपीठ की परंपरा — दिग्विजयनाथ से अवैद्यनाथ और अब योगी आदित्यनाथ तक — भारतीय राजनीति में धार्मिक संस्थाओं के बढ़ते प्रभाव की एक सुसंगत कड़ी है, जिसकी व्याख्या इतिहासकार और समाजशास्त्री अलग-अलग दृष्टिकोण से करते रहेंगे।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महंत अवैद्यनाथ कौन थे?
महंत अवैद्यनाथ गोरक्षपीठ, गोरखपुर के पीठाधीश्वर थे, जिन्होंने धर्म को सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ा। उनका जन्म 28 मई 1921 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में हुआ था और 12 सितंबर 2014 को गोरखपुर में उनका निधन हुआ।
महंत अवैद्यनाथ का राम जन्मभूमि आंदोलन में क्या योगदान था?
1984 में वे श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष बने और देशभर के अखाड़ों व धर्माचार्यों को एकजुट किया। 1990 में कारसेवा के दौरान विवादित ढाँचे पर पूजा का आयोजन उनके नेतृत्व में हुआ, जिसे उनके अडिग संकल्प का प्रतीक माना जाता है।
योगी आदित्यनाथ महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी कैसे बने?
1998 में महंत अवैद्यनाथ ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेते हुए योगी आदित्यनाथ को गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया। उसी वर्ष योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद चुने गए और तब देश के सबसे युवा सांसद बने।
महंत अवैद्यनाथ ने सामाजिक समरसता के लिए क्या किया?
उन्होंने हिंदू समाज में छुआछूत और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध सक्रिय अभियान चलाया। 1980 के दशक में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में हरिजनों के सामूहिक धर्मांतरण की घटना के बाद उन्होंने सामाजिक एकता को अपने जीवन का केंद्रीय लक्ष्य बना लिया।
महंत अवैद्यनाथ का राजनीतिक जीवन कैसा रहा?
उन्होंने 1962, 1967, 1974 और 1977 में उत्तर प्रदेश विधानसभा की मानीराम सीट से विजय प्राप्त की। इसके बाद 1970, 1989, 1991 और 1996 में गोरखपुर लोकसभा सीट से सांसद रहे; बाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) से भी उनका जुड़ाव हुआ।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 8 महीने पहले
  3. 9 महीने पहले
  4. 10 महीने पहले
  5. 10 महीने पहले
  6. 10 महीने पहले
  7. 10 महीने पहले
  8. 10 महीने पहले