मराठी भाषा विवाद: NCP (SP) के नसीम सिद्दीकी ने फडणवीस सरकार के फैसले का स्वागत किया, BJP पर साधा निशाना
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के प्रवक्ता नसीम सिद्दीकी ने 30 अगस्त को महाराष्ट्र सरकार के मराठी भाषा संबंधी फैसले का स्वागत किया, जिसमें मुंबई में रहने वाले गैर-मराठी लोगों को भाषा सीखने के लिए एक वर्ष का अतिरिक्त समय दिया गया है। उन्होंने इसे लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर लिया गया सकारात्मक कदम बताया, हालाँकि साथ ही इसे एक राजनीतिक निर्णय भी करार दिया।
सिद्दीकी ने क्या कहा
सिद्दीकी ने कहा, 'सरकार ने जो फैसला लिया है, वह बहुत अच्छा फैसला है। यह लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर लिया गया है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि शिवसेना (शिंदे गुट) और एनसीपी (अजित पवार गुट) इस निर्णय का कुछ हद तक विरोध कर सकती हैं, लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जड़ें उत्तर प्रदेश और बिहार में हैं, महाराष्ट्र में नहीं।
गैर-मराठी लोगों को राहत
सिद्दीकी ने इस बात पर जोर दिया कि मुंबई में रहने वाले ड्राइवर और कैब चालकों सहित गैर-मराठी वर्ग को अतिरिक्त समय मिलना उचित है। उन्होंने कहा, 'हम पिछले चार-छह इंटरव्यू में यह कह रहे हैं कि कोई भी भाषा 2-4 महीने में नहीं सीखी जा सकती।' यह बयान उस पृष्ठभूमि में आया है जब महाराष्ट्र सरकार ने गैर-मराठी भाषियों के लिए मराठी सीखने की अनिवार्यता पर एक समयसीमा तय की थी।
सामाजिक मुद्दों पर सिद्दीकी की टिप्पणी
एक अन्य सवाल के जवाब में सिद्दीकी ने छुआछूत के मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा, 'देश को महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी मिली, लेकिन छुआछूत से आजादी नहीं मिली।' उन्होंने यह भी कहा कि यह समस्या आजादी से पहले भी थी और वही परंपरा आज भी जारी है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के परिवार की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए ब्राह्मणवाद पर टिप्पणी की, जो विवादास्पद मानी जा सकती है।
दानिश अली की भागवत पर प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता दानिश अली ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 'आरएसएस कई चेहरों वाला संगठन है।' हालाँकि उन्होंने इस पर विस्तार से कोई टिप्पणी नहीं की।
आगे की राजनीतिक दिशा
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब महाराष्ट्र में भाषाई पहचान और प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों को लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण गहरा हो रहा है। गौरतलब है कि मराठी भाषा की अनिवार्यता का मुद्दा महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और शिवसेना जैसे दलों की राजनीति का केंद्र रहा है। महायुति सरकार के इस फैसले पर विपक्ष की मिली-जुली प्रतिक्रिया राजनीतिक परिदृश्य की जटिलता को दर्शाती है।