मौलाना खालिद रशीद का स्पष्ट जवाब: भारत में इस्लामिक कानून की मांग बेबुनियाद, संविधान ही सर्वोच्च
सारांश
मुख्य बातें
इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के चेयरमैन मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने 29 अगस्त को लखनऊ में ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी के उस बयान की कड़ी निंदा की, जिसमें भारत में इस्लामिक कानून लागू करने की मांग की गई थी। मौलाना खालिद रशीद ने साफ कहा कि ऐसे बयानों की इस देश में कोई जगह नहीं है और भारत केवल अपने संविधान के अनुसार ही चलेगा।
मौलाना खालिद रशीद का स्पष्ट रुख
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने शनिवार को मीडिया से बातचीत में कहा, 'यह मुल्क अपने संविधान के मुताबिक ही चलेगा और अपने मुल्क में हर शख्स को ये हक और इख्तियार हासिल है, आजादी हासिल है कि वो अपने इबादत की हद तक, अपने पर्सनल लॉ की हद तक, अपने मजहबी कानून यानी पर्सनल लॉ पर अमल कर सकता है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि पर्सनल लॉ भी संविधान के दायरे तक ही सीमित हैं।
रेप रोकने के लिए कानून पर्याप्त, तालीम की जरूरत
मौलाना खालिद रशीद ने आगे कहा कि देश में यौन अपराधों को रोकने के लिए पहले से पर्याप्त कानून मौजूद हैं। उनके अनुसार, असली जरूरत यह है कि धार्मिक नेता समाज की बुराइयों को दूर करने पर ध्यान दें। उन्होंने कहा कि जब तक लोगों की सही शिक्षा और नैतिक परवरिश का इंतजाम नहीं होगा, तब तक इस तरह के अपराध होते रहेंगे।
विवाद की जड़: मौलाना साजिद रशीदी का बयान
गौरतलब है कि इस पूरे विवाद की शुरुआत शुक्रवार को हुई, जब ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने कहा था, 'जब तक इस देश में इस्लामिक कानून लागू नहीं होता, तब तक रेप, अपराध, भ्रष्टाचार और ऐसी अन्य चीजों को खत्म नहीं किया जा सकता।' उन्होंने इस्लामिक देशों का हवाला देते हुए दावा किया था कि वहाँ अपराध नहीं होते और लोग खुशहाल जीवन जीते हैं।
व्यापक संदर्भ और सामाजिक प्रभाव
यह ऐसे समय में आया है जब देश में धार्मिक कानूनों और नागरिक संहिता को लेकर बहस तेज है। मौलाना खालिद रशीद जैसे प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरु का संविधान के पक्ष में खड़े होना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि मुस्लिम समुदाय के भीतर भी ऐसे बयानों पर एकराय नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की आंतरिक असहमति लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करती है।
आगे क्या
मौलाना साजिद रशीदी के बयान पर अब तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएँ अपेक्षित हैं। यह मामला भारत में धर्म, कानून और संविधान के बीच की सीमारेखा पर एक बार फिर बहस को केंद्र में ले आया है।