मोहर्रम जुलूस शांतिपूर्ण: मौलाना शहाबुद्दीन ने योगी सरकार की तारीफ की, अखिलेश पर कसा तंज
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश में मोहर्रम के ताजिया जुलूस 27 जून 2025 को पूरी तरह शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुए। प्रदेश के किसी भी जिले से किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली। इस्लामिक धर्मगुरु मौलाना शहाबुद्दीन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में की गई कानून-व्यवस्था की तैयारियों की मुक्त कंठ से सराहना की और समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तीखा निशाना साधा।
मौलाना शहाबुद्दीन की प्रतिक्रिया
मौलाना शहाबुद्दीन ने कहा कि इस बार मोहर्रम के ताजिए और जुलूस पूरे देश में, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, पूरी तरह व्यवस्थित और शांतिपूर्ण रहे। उन्होंने कहा, 'न तो बिजली के तार हटाने की जरूरत पड़ी और न ही कहीं पेड़ों की शाखाएं काटनी पड़ीं' — जो प्रशासनिक तैयारी की गहराई को दर्शाता है।
उन्होंने सरकार, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का आभार जताया और कहा कि सभी ने पूरे 10 दिनों तक मोहर्रम के दौरान निरंतर व्यवस्थाएं बनाए रखीं।
अखिलेश यादव पर तीखा हमला
मौलाना शहाबुद्दीन ने अखिलेश यादव पर सीधा प्रहार करते हुए कहा, 'अगर आज अखिलेश यादव मुख्यमंत्री होते तो कई शहरों में फसाद हो चुके होते और कई शहर आग की लपटों में होते।' यह बयान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि एक प्रमुख इस्लामिक धर्मगुरु का यह सार्वजनिक कथन सपा के परंपरागत मुस्लिम वोट आधार में दरार की ओर इशारा करता है।
गाजियाबाद में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था
गाजियाबाद जिले के ट्रांस हिंडन जोन के अंतर्गत फर्रुखनगर में मुहर्रम का ताजिया जुलूस बिना किसी घटना के संपन्न हुआ। पुलिस और रैपिड रिस्पॉन्स फोर्स (RRF) ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए। जुलूस के पूरे मार्ग पर निगरानी रखी गई, सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराया गया और पूरे आयोजन की वीडियोग्राफी भी कराई गई।
मुरादाबाद में 100 साल पुरानी परंपरा जीवंत
मुरादाबाद जिले में 100 वर्ष से अधिक पुरानी 'कंबल ताजिया' परंपरा के तहत भी जुलूस निकाले गए। एसएसपी सतपाल अंतिल के अनुसार, जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 518 ताजिया जुलूस और उनसे जुड़े कार्यक्रम प्रस्तावित थे। अधिकारियों ने बताया कि अधिकांश स्थानों पर कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गए।
क्या होगा आगे
मोहर्रम के शांतिपूर्ण समापन को योगी सरकार की सांप्रदायिक सौहार्द नीति की सफलता के रूप में देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि दीर्घकालिक सामाजिक सद्भाव के लिए केवल कानून-व्यवस्था से परे संवाद और विश्वास-निर्माण की भी आवश्यकता है। इस बयानबाजी का राजनीतिक असर आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।