26 जुलाई 2026
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मन की बात में मोदी ने सराहा सीतामढ़ी का 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल, 40 किलो प्लास्टिक से बनती है एक बेंच

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मन की बात में मोदी ने सराहा सीतामढ़ी का 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल, 40 किलो प्लास्टिक से बनती है एक बेंच

सारांश

सीतामढ़ी में फेंका गया प्लास्टिक अब स्कूलों और पार्कों की बेंच बन रहा है — हर बेंच में 40 किलो कचरा। PM मोदी ने 'मन की बात' में इस 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल को राष्ट्रीय पहचान दी। चार ब्लॉकों से 8,000 किलो प्लास्टिक जमा, 85 बेंचें तैयार — बिहार का यह जिला देश के लिए एक नई मिसाल पेश कर रहा है।

मुख्य बातें

PM मोदी ने 'मन की बात' के 136वें एपिसोड में सीतामढ़ी की सिंगल-यूज प्लास्टिक रीसाइक्लिंग पहल की सार्वजनिक सराहना की।
जिले में चार प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट (PWMU) सक्रिय हैं; मुख्य यूनिट बाजपट्टी में स्थित है।
एक चरण में चार ब्लॉकों से 8,000 किलोग्राम प्लास्टिक संग्रहित; 4,000 किलोग्राम से 85 बेंचें तैयार।
प्रत्येक बेंच निर्माण में लगभग 40 किलोग्राम सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग होता है।
बेंचें सरकारी स्कूलों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर लगाई जा रही हैं; पहल छात्रों में पर्यावरण जागरूकता भी बढ़ा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' के 136वें एपिसोड में बिहार के सीतामढ़ी जिले की सिंगल-यूज प्लास्टिक रीसाइक्लिंग पहल को राष्ट्रीय मंच पर रेखांकित किया। इस 'वेस्ट टू वेल्थ' मॉडल के तहत फेंका गया प्लास्टिक कचरा टिकाऊ बेंचों और अन्य उपयोगी उत्पादों में बदला जा रहा है, जो सरकारी स्कूलों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर लगाई जा रही हैं। प्रधानमंत्री की सराहना के बाद स्थानीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने इस पहल के पर्यावरणीय और सामाजिक फायदों का विस्तार से ब्यौरा दिया।

कैसे काम करता है यह मॉडल

जिले में बाजपट्टी स्थित प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट (PWMU) इस पूरे तंत्र का केंद्रबिंदु है। जिला मैनेजर राघव झा ने बताया कि यह यूनिट तीन-चार अन्य ब्लॉकों से जुड़ी है और पूरे सीतामढ़ी जिले में ऐसी चार यूनिट सक्रिय हैं। विभिन्न ब्लॉकों और कलेक्शन सेंटरों से इकट्ठा किया गया प्लास्टिक यहाँ प्रोसेसिंग के लिए लाया जाता है।

एक दर्ज चरण में डुमरा, रीगा, बाजपट्टी और रुन्नीसैदपुर — इन चार ब्लॉकों से लगभग 8,000 किलोग्राम सिंगल-यूज प्लास्टिक संग्रहित किया गया। इसमें से 4,000 किलोग्राम प्लास्टिक को रीसाइकिल कर 85 बेंचें तैयार की गईं। प्रत्येक बेंच के निर्माण में लगभग 40 किलोग्राम सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग होता है।

अधिकारियों की राय: प्रदूषण में आई कमी

राघव झा ने कहा, 'इस्तेमाल के बाद फेंका गया प्लास्टिक प्रदूषण फैलाता है, क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से नष्ट नहीं होता। इसलिए हम इसे उपयोगी उत्पादों में रीसाइकिल करते हैं, जिनका उपयोग अलग-अलग कामों के लिए किया जा सकता है। इस पहल को आगे बढ़ाने में स्थानीय प्रतिनिधियों का पूरा सहयोग मिल रहा है।'

मुखिया प्रतिनिधि रंजीत सिंह ने इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ठोस कदम बताया। उन्होंने कहा, 'सिंगल-यूज प्लास्टिक, जिसे लोग आमतौर पर फेंक देते हैं, उसे अब इकट्ठा कर रीसाइकिल किया जा रहा है और बेंच व अन्य उपयोगी चीजें बनाई जा रही हैं। पर्यावरण के नजरिए से यह बेहद फायदेमंद है।'

जनप्रतिनिधियों का नजरिया

सरपंच प्रतिनिधि अनवरुल हक ने कहा कि प्रधानमंत्री की सार्वजनिक सराहना से आम नागरिकों को इस अभियान से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी। वार्ड सदस्य देवेंद्र साह ने बताया कि पहले कचरा कहीं भी फेंक दिया जाता था, लेकिन अब प्लास्टिक को अलग कर प्रोसेसिंग के लिए भेजा जाता है और तैयार उत्पाद पंचायत की विभिन्न जगहों पर लगाए जाते हैं।

पीएम मोदी ने क्या कहा

प्रधानमंत्री मोदी ने 'मन की बात' में कहा, 'बच्चे यह सीख रहे हैं कि जिस प्लास्टिक को वे कभी कचरा समझकर फेंक देते थे, उसे टेक्नोलॉजी और सही मैनेजमेंट के ज़रिए समुदाय की एक कीमती संपत्ति में बदला जा सकता है। यह कोशिश दिखाती है कि 'रिड्यूस, रियूज और रीसाइकिल' के सिद्धांत अब सिर्फ नारे नहीं रह गए, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन रहे हैं।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिला प्रशासन ने स्थानीय यूनिट के साथ मिलकर इसमें अहम भूमिका निभाई है।

आगे की राह

सीतामढ़ी का यह मॉडल ऐसे समय में सुर्खियों में आया है जब प्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक पर्यावरणीय चुनौती बनी हुई है। राष्ट्रीय मान्यता मिलने के बाद यह पहल अन्य जिलों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन सकती है। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, पहल का विस्तार जारी है और अधिक ब्लॉकों को इस नेटवर्क से जोड़ने की योजना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल स्केल का है — जिले की चार यूनिटें और 85 बेंचें एक शुरुआत हैं, समाधान नहीं। 'मन की बात' में प्रधानमंत्री की सराहना से जागरूकता बढ़ती है, पर यह भी देखना होगा कि क्या यह पहल संस्थागत बजट और नीतिगत ढाँचे से जुड़ती है या सिर्फ एक प्रेरक उदाहरण बनकर रह जाती है। भारत हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है — जिले स्तर के प्रयोगों को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर दोहराने के लिए सिर्फ प्रशंसा नहीं, दीर्घकालिक वित्त पोषण और निगरानी तंत्र चाहिए।
RashtraPress
26 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीतामढ़ी की 'वेस्ट टू वेल्थ' पहल क्या है?
यह बिहार के सीतामढ़ी जिले की एक प्लास्टिक रीसाइक्लिंग पहल है, जिसमें सिंगल-यूज प्लास्टिक कचरे को इकट्ठा कर टिकाऊ बेंचों और अन्य उत्पादों में बदला जाता है। जिले में चार प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट (PWMU) इस काम को अंजाम देती हैं।
PM मोदी ने इस पहल का जिक्र कहाँ किया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' के 136वें एपिसोड में सीतामढ़ी की इस पहल की सराहना की और इसे प्लास्टिक प्रदूषण की एक व्यावहारिक और अनुकरणीय समाधान के रूप में देश के सामने रखा।
एक बेंच बनाने में कितना प्लास्टिक लगता है और अब तक कितनी बेंचें बनी हैं?
प्रत्येक बेंच के निर्माण में लगभग 40 किलोग्राम सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग होता है। एक दर्ज चरण में चार ब्लॉकों से 8,000 किलोग्राम प्लास्टिक संग्रहित किया गया, जिसमें से 4,000 किलोग्राम से 85 बेंचें तैयार की गईं।
ये बेंचें कहाँ लगाई जा रही हैं?
तैयार बेंचें सरकारी स्कूलों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लगाई जा रही हैं। वार्ड सदस्य देवेंद्र साह के अनुसार इन्हें पंचायत की विभिन्न जगहों पर स्थापित किया जा रहा है।
इस पहल से पर्यावरण को क्या फायदा है?
सिंगल-यूज प्लास्टिक नॉन-बायोडिग्रेडेबल होता है और खुले में फेंके जाने पर दीर्घकालिक प्रदूषण फैलाता है। रीसाइक्लिंग से यह कचरा लैंडफिल और जल स्रोतों तक नहीं पहुँचता और उपयोगी उत्पादों में बदलकर सामुदायिक संपत्ति बन जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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