मोहम्मद अदीब का बड़ा बयान: 'भारत के मुसलमान खतरे में, राजनीति से पीछे हटना ज़रूरी'

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मोहम्मद अदीब का बड़ा बयान: 'भारत के मुसलमान खतरे में, राजनीति से पीछे हटना ज़रूरी'

सारांश

राज्यसभा के पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब का विस्फोटक बयान — मुसलमानों को राजनीति छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि उनकी भागीदारी ध्रुवीकरण का हथियार बन चुकी है। SIR पर आरोप, ओवैसी पर सवाल और विपक्षी एकता की माँग — एक पूर्व सांसद का असाधारण आत्म-मंथन।

मुख्य बातें

राज्यसभा के पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब ने 16 मई 2026 को कहा कि भारत के मुसलमान गहरे संकट में हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) के ज़रिये मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से काटे जा रहे हैं।
अदीब का सुझाव है कि यदि विपक्षी दल एकजुट नहीं होते, तो मुसलमानों को स्वेच्छा से चुनावी राजनीति से दूरी बना लेनी चाहिए।
असदुद्दीन ओवैसी की 2-3 प्रतिशत समर्थक आधार को उन्होंने हताशा की उपज बताया, न कि ठोस विकल्प।
भोपाल हमले और पश्चिम बंगाल में मस्जिदों की घटनाओं का हवाला देते हुए उन्होंने सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर चिंता जताई।
उन्होंने बोहरा और खोजा समुदायों को उदाहरण बताया, जो राजनीति से दूर रहकर खुशहाल हैं।

राज्यसभा के पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब ने 16 मई 2026 को नई दिल्ली में एक विशेष बातचीत में कहा कि भारत के मुसलमान गहरे संकट में हैं और देश को बचाने के लिए उन्हें अब राजनीति से दूरी बना लेनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के ज़रिये मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटे जा रहे हैं।

मुख्य बयान और तर्क

अदीब के अनुसार, पिछले एक दशक में मुसलमानों को चुनावी राजनीति में एक 'कैटलिस्ट' की भूमिका में सीमित कर दिया गया है — जहाँ चुनाव रोज़गार और रोज़ी-रोटी के बजाय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर जीते जाते हैं। उन्होंने कहा, 'अगर इस देश को बचाना है, तो चुनाव हिंदू-मुसलमान के नाम पर नहीं, बल्कि रोज़गार और विकास के मुद्दों पर होने चाहिए।'

उन्होंने तर्क दिया कि मुसलमानों की चुनावी भागीदारी उन सेकुलर हिंदू उम्मीदवारों को भी नुकसान पहुँचाती है, जो मुस्लिम समर्थन के कारण 'देशद्रोही' का ठप्पा झेलते हैं। उनके अनुसार, इस स्थिति का एकमात्र समाधान यह है कि सभी विपक्षी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ें — और यदि वे ऐसा नहीं करते, तो मुसलमानों को चुनावी प्रक्रिया से स्वेच्छा से अलग हो जाना चाहिए।

SIR और मतदाता सूची पर चिंता

अदीब ने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के माध्यम से मुस्लिम मतदाताओं के नाम सूचियों से हटाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह इसलिए हो रहा है क्योंकि एक राजनीतिक पक्ष मानता है कि मुसलमान उन्हें वोट नहीं देते। उन्होंने पश्चिम बंगाल के संदर्भ में भी इशारा किया, जहाँ कथित तौर पर मुख्यमंत्री स्तर पर भी ऐसे बयान आए हैं।

सामाजिक स्थिति पर गंभीर आरोप

अदीब ने कहा कि सड़क पर, मस्जिद के भीतर और बाहर मुसलमानों को अपनी पहचान साबित करनी पड़ रही है। उन्होंने भोपाल में एक मुस्लिम युवक पर हुए हमले का उल्लेख करते हुए कहा कि आरोपी पुलिस सुरक्षा में रहे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद मस्जिदों के भीतर जाकर बैंड बजाए गए और ये मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे।

उन्होंने चेतावनी दी, 'अगर अदालतें इसी तरह खामोश रहीं और पुलिस में नफरत बनी रही, तो हालात म्यांमार जैसे हो सकते हैं।' हालाँकि, यह उनका व्यक्तिगत आकलन है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

ओवैसी और विपक्षी दलों पर सवाल

अदीब ने असदुद्दीन ओवैसी की राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि ओवैसी की 2-3 प्रतिशत की समर्थक आधार इसलिए नहीं है कि वे कोई ठोस विकल्प दे रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि मुसलमान हताशा में उनके साथ जाते हैं। उन्होंने कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों पर भी निशाना साधा, कहा कि हर पार्टी अपना हिंदू वोट बचाने में लगी है और मुसलमानों को 'मजबूर मतदाता' मानकर चलती है।

आगे की राह

अदीब ने बोहरा और खोजा जैसी मुस्लिम उपसमुदायों का उदाहरण दिया, जो परंपरागत रूप से चुनावी राजनीति से दूर रहती हैं और उनके अनुसार, इसी में उनकी खुशहाली है। उनका सुझाव है कि आम मुसलमान राजनीति की जगह शिक्षा और आर्थिक विकास पर ध्यान दें। गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में मतदाता सूची पुनरीक्षण और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर बहस तेज़ है। आने वाले दिनों में इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और तेज़ होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उसे और अदृश्य बना देती है। SIR पर उनके आरोप गंभीर हैं और इनकी स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए — परंतु समाधान के रूप में 'चुनाव न करो' एक ऐसा नुस्खा है जो बीमारी से ज़्यादा खतरनाक हो सकता है। मुख्यधारा की कवरेज इस बयान को केवल सनसनी के रूप में देख रही है, जबकि असली सवाल यह है कि दशकों की लोकतांत्रिक भागीदारी के बाद एक पूर्व सांसद को यह कहने की नौबत क्यों आई।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मोहम्मद अदीब ने मुसलमानों को राजनीति से दूर रहने की सलाह क्यों दी?
अदीब का तर्क है कि मुसलमानों की चुनावी भागीदारी ध्रुवीकरण का हथियार बन चुकी है, जिससे सांप्रदायिक आधार पर चुनाव जीते जाते हैं और विकास के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। उनके अनुसार, यदि मुसलमान चुनाव से दूर रहें, तो राजनीतिक दलों की 'मजबूर मतदाता' वाली धारणा टूटेगी और चुनाव रोज़गार-केंद्रित हो सकते हैं।
SIR के ज़रिये मुस्लिम वोट काटने का आरोप क्या है?
अदीब ने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया का इस्तेमाल मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाने के लिए किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह इसलिए हो रहा है क्योंकि एक राजनीतिक पक्ष मानता है कि मुसलमान उन्हें वोट नहीं देते। यह आरोप उनका व्यक्तिगत आकलन है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
क्या मुसलमानों के वोट न देने से उनका मताधिकार नहीं छिन जाएगा?
अदीब ने इस सवाल पर कहा कि जब सड़क पर, मस्जिद में भी पहचान साबित करनी पड़े और बुलडोजर अधिकतर मुसलमानों के घरों पर चले, तो मताधिकार पहले ही सीमित हो चुका है। उन्होंने तर्क दिया कि स्वैच्छिक पीछेहटी एक रणनीतिक कदम है, न कि अधिकार का त्याग।
अदीब ने असदुद्दीन ओवैसी पर क्या सवाल उठाए?
अदीब ने कहा कि ओवैसी की 2-3 प्रतिशत की समर्थक आधार कोई ठोस राजनीतिक विकल्प नहीं है, बल्कि मुसलमानों की हताशा का नतीजा है। उनके अनुसार, ओवैसी कोई नई राह नहीं दिखा रहे, बल्कि निराश मतदाताओं की भावनाओं को दिशा दे रहे हैं।
अदीब के अनुसार भारत में मुसलमानों की स्थिति क्या है?
अदीब ने कहा कि यदि न्यायपालिका खामोश रही और पुलिस में सांप्रदायिक पूर्वाग्रह बना रहा, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। उन्होंने भोपाल हमले और पश्चिम बंगाल में मस्जिदों की घटनाओं का हवाला दिया। यह उनका व्यक्तिगत आकलन है; स्थिति की व्यापक तुलनात्मक पुष्टि अलग स्रोतों से ज़रूरी है।
राष्ट्र प्रेस
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