नामरूप यूरिया प्लांट 2028 तक होगा तैयार, ₹11,000 करोड़ की परियोजना को मिली नई रफ़्तार: CM हिमंता
सारांश
मुख्य बातें
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बुधवार, 24 जून को घोषणा की कि पूर्वी असम के नामरूप में दशकों से अटकी पड़ी ₹11,000 करोड़ की यूरिया उर्वरक परियोजना अब पटरी पर आ चुकी है और 2028 तक इसके पूर्ण होने की प्रबल संभावना है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना असम और समूचे पूर्वोत्तर भारत के कृषि व औद्योगिक विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगी।
दशकों की देरी के बाद मिली गति
मुख्यमंत्री सरमा के अनुसार, इस परियोजना पर काम लंबे समय तक इसलिए नहीं हो सका क्योंकि कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली सरकार के कार्यकाल में यह धारणा बनी रही कि प्रस्तावित स्थल अंतरराष्ट्रीय सीमा के अत्यधिक निकट है। उन्होंने आरोप लगाया कि रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद इस स्थान-संबंधी आपत्ति को आधार बनाकर परियोजना को वर्षों तक लंबित रखा गया।
गौरतलब है कि नामरूप का औद्योगिक इतिहास पुराना है — यहाँ पहले से बड़े उर्वरक संयंत्र स्थापित हैं और इसे असम के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में गिना जाता रहा है। नई इकाई इस विरासत को आधुनिक तकनीक और उन्नत उत्पादन क्षमता के साथ आगे बढ़ाएगी।
PM मोदी ने रखी थी आधारशिला
मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष इस परियोजना की आधारशिला रखी थी, जिसके बाद निर्माण कार्य को औपचारिक रूप से हरी झंडी मिली। केंद्र सरकार इसे उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की अपनी व्यापक रणनीति का अभिन्न अंग मानती है।
किसानों और अर्थव्यवस्था पर असर
अधिकारियों का अनुमान है कि नामरूप संयंत्र के चालू होने से देश में यूरिया उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और पूर्वोत्तर के किसानों की अन्य राज्यों से उर्वरक आपूर्ति पर निर्भरता घटेगी। डिब्रूगढ़ जिले और आसपास के क्षेत्रों में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोज़गार के बड़े अवसर सृजित होने की भी उम्मीद है।
राज्य सरकार के अधिकारियों ने इस परियोजना को कृषि विकास, उर्वरक उपलब्धता और असम-पूर्वोत्तर के समग्र आर्थिक उत्थान में योगदान देने वाली 'क्रांतिकारी पहल' बताया है।
आगे की राह
परियोजना को केंद्र की औद्योगिक अवसंरचना सुदृढ़ीकरण नीति का हिस्सा माना जा रहा है। 2028 की समय-सीमा के साथ अब निर्माण कार्य तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। यदि यह परियोजना निर्धारित समय पर पूरी होती है, तो यह न केवल असम बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत की कृषि आत्मनिर्भरता की दिशा में एक निर्णायक मोड़ होगा।