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नवादा की ममता देवी बनीं 'लखपति दीदी': जीविका SHG के सहयोग से ₹10-12 लाख सालाना कमाई

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नवादा की ममता देवी बनीं 'लखपति दीदी': जीविका SHG के सहयोग से ₹10-12 लाख सालाना कमाई

सारांश

सिलाई मशीन से शुरुआत, जीविका SHG का सहारा और अपनी जिद — नवादा की ममता देवी ने फ्लैक्स प्रिंटिंग का कारोबार खड़ा कर सालाना ₹10-12 लाख की कमाई तक का सफर तय किया। तीन बेटों को रोज़गार दिया, दो अन्य को भी काम — यही है असली 'लखपति दीदी' की कहानी।

मुख्य बातें

ममता देवी (नवादा, बिहार) ने 4 अप्रैल 2020 को विश्वकर्मा जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपनी उद्यमिता यात्रा शुरू की।
वर्ष 2021 में जीविका ऋण से कादिरगंज में फ्लैक्स प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की; बाद में डिजिटल, ऑफसेट और स्क्रीन प्रिंटिंग भी जोड़ी।
वर्ष 2022 में समूह से ₹25,000 और बिहार ग्रामीण बैंक से ₹1 लाख का व्यक्तिगत ऋण लेकर कारोबार का विस्तार किया।
मासिक आय ₹1 से 1.5 लाख ; वार्षिक आय ₹10 से 12 लाख — 'लखपति दीदी' का दर्जा हासिल।
परिवार के तीनों बेटे कारोबार में सक्रिय; दो लोगों को नियमित और दो-तीन को सीजनल रोज़गार।

बिहार के नवादा जिले के गोपालगंज गांव की ममता देवी ने साधारण गृहिणी से सफल उद्यमी बनने तक का सफर तय कर 'लखपति दीदी' का दर्जा हासिल किया है। जीविका स्वयं सहायता समूह (SHG) के आर्थिक सहयोग और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने फ्लैक्स और डिजिटल प्रिंटिंग का एक सफल कारोबार खड़ा किया है, जिससे अब उनकी मासिक आय ₹1 से 1.5 लाख और वार्षिक आय ₹10 से 12 लाख के आसपास पहुँच गई है। यह कहानी ग्रामीण बिहार में महिला उद्यमिता की एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी है।

संघर्ष से शुरुआत: सीमित साधन, असीमित हौसला

ममता देवी सदर प्रखंड अंतर्गत जमुआवां पटवां सराय पंचायत के गोपालगंज गांव की निवासी हैं। परिवार के पास खेती के लिए अपनी जमीन नहीं थी और आर्थिक स्थिति सामान्य थी। उनके पति बिहार शरीफ में लोहे की वेल्डिंग की दुकान चलाते थे, जबकि ममता देवी घर पर सिलाई मशीन से महिलाओं और बच्चों के कपड़े सिलकर परिवार का सहयोग करती थीं।

इस सीमित आमदनी में तीन बेटों समेत पूरे परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं था। यह वह दौर था जब आत्मनिर्भरता की इच्छाशक्ति तो थी, लेकिन अवसर और पूंजी की कमी थी।

जीविका SHG से जुड़ाव: बदलाव की नींव

आर्थिक स्थिति सुधारने के उद्देश्य से ममता देवी 4 अप्रैल 2020 को विश्वकर्मा जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। उन्होंने समूह की साप्ताहिक बैठकों में नियमित भागीदारी शुरू की और प्रति सप्ताह ₹10 की बचत करने लगीं। समूह ने उन्हें न केवल बचत और ऋण की सुविधा दी, बल्कि एक नया व्यवसाय शुरू करने का आत्मविश्वास भी दिलाया।

गौरतलब है कि जीविका बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रामीण आजीविका परियोजना है, जो राज्यभर में लाखों महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए आर्थिक सशक्तिकरण का मंच प्रदान करती है।

प्रिंटिंग कारोबार की स्थापना और विस्तार

वर्ष 2021 में ममता देवी ने जीविका समूह से ऋण लेकर नवादा से करीब छह किलोमीटर पूर्व कादिरगंज में किराये पर दुकान ली और फ्लैक्स प्रिंटिंग मशीन स्थापित की। यह स्थान कौआकोल, पकरीबरावां, वारिसलीगंज और जमुई की ओर जाने वाली मुख्य सड़क के किनारे होने के कारण व्यावसायिक दृष्टि से अनुकूल साबित हुआ।

अपने मंझले बेटे — जिसने ITI और कंप्यूटर में डिप्लोमा किया है — के साथ मिलकर उन्होंने डिजिटल, ऑफसेट और स्क्रीन प्रिंटिंग का काम भी शुरू किया। वर्ष 2022 में शादी के सीजन में कार्ड सामग्री खरीदने के लिए पूंजी की कमी पड़ी तो समूह से ₹25,000 का ऋण लिया। इसके अलावा कार्यशील पूंजी के लिए बिहार ग्रामीण बैंक से जीविका के माध्यम से ₹1 लाख का व्यक्तिगत ऋण भी लिया।

परिवार की सामूहिक भागीदारी

ममता देवी के कारोबार में उनके तीनों बेटों की सक्रिय भूमिका है। मंझला बेटा डिजिटल डिज़ाइन संभालता है, बड़ा बेटा व्यवसाय संचालन में सहयोग करता है, जबकि छोटा बेटा मोबाइल रिपेयरिंग के साथ-साथ प्रिंटिंग प्रेस में भी हाथ बंटाता है। इसके अलावा दो लोगों को नियमित रोज़गार मिला हुआ है, और फरवरी से अप्रैल के व्यस्त सीजन में दो-तीन अतिरिक्त दैनिक कर्मियों को भी काम मिलता है।

प्रेस में फ्लैक्स, शादी कार्ड, कैलेंडर, डायरी, बिल-बुक, लाइट बोर्ड, स्ट्रेंडी और प्रचार वाहनों का निर्माण होता है। निजी स्कूलों की प्रचार सामग्री, शादी के कार्ड और पर्व-त्योहारों के बैनर बड़े ऑर्डर का स्रोत हैं।

आज का मुकाम और आगे की राह

पिछले पाँच वर्षों में लगातार विस्तार के बाद ममता देवी की मासिक आय ₹1 से 1.5 लाख और वार्षिक आय ₹10 से 12 लाख तक पहुँच गई है। वह समूह और बैंक से लिए गए ऋणों की नियमित अदायगी भी कर रही हैं। ममता देवी का कहना है कि जीविका स्वयं सहायता समूह के सहयोग और प्रोत्साहन के बिना यह कारोबार खड़ा कर पाना और इस स्तर तक पहुँचाना संभव नहीं होता।

यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र और राज्य सरकारें ग्रामीण महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए 'लखपति दीदी' जैसी योजनाओं पर विशेष ज़ोर दे रही हैं। ममता देवी की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि सही मंच, सूक्ष्म वित्त और व्यक्तिगत संकल्प मिलकर ग्रामीण जीवन की तस्वीर बदल सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसे महज़ एक व्यक्तिगत सफलता की गाथा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा — यह जीविका जैसे संस्थागत ढाँचे की उस क्षमता को भी रेखांकित करती है जो सूक्ष्म ऋण को उद्यम में बदल सकती है। असली सवाल यह है कि बिहार में ऐसी हज़ारों संभावित 'ममता देवियाँ' अभी भी समूहों से जुड़ने के बावजूद व्यवसाय तक नहीं पहुँच पाती हैं — कारण प्रशिक्षण और बाज़ार संपर्क की कमी है, जो ऋण से कहीं अधिक ज़रूरी है। 'लखपति दीदी' योजना की सफलता तब सिद्ध होगी जब ऐसी कहानियाँ अपवाद नहीं, बल्कि नियम बनें।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ममता देवी 'लखपति दीदी' कैसे बनीं?
ममता देवी ने 2020 में जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़कर ऋण की मदद से 2021 में फ्लैक्स प्रिंटिंग का कारोबार शुरू किया। पाँच वर्षों में कारोबार का विस्तार करते हुए उनकी वार्षिक आय ₹10 से 12 लाख तक पहुँच गई, जिससे उन्हें 'लखपति दीदी' का दर्जा मिला।
जीविका स्वयं सहायता समूह क्या है और यह महिलाओं की कैसे मदद करता है?
जीविका बिहार सरकार की ग्रामीण आजीविका परियोजना है, जो महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए बचत, ऋण और उद्यमिता प्रशिक्षण का अवसर देती है। ममता देवी के मामले में समूह ने व्यवसाय शुरू करने और विस्तार के हर चरण में वित्तीय सहायता प्रदान की।
ममता देवी की प्रिंटिंग प्रेस में क्या-क्या सेवाएँ उपलब्ध हैं?
उनकी प्रेस में फ्लैक्स, शादी कार्ड, कैलेंडर, डायरी, बिल-बुक की छपाई के साथ-साथ लाइट बोर्ड, स्ट्रेंडी और प्रचार वाहनों का निर्माण होता है। डिजिटल, ऑफसेट और स्क्रीन प्रिंटिंग की भी सुविधा है।
ममता देवी के कारोबार से कितने लोगों को रोज़गार मिला है?
उनके तीनों बेटे कारोबार में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा दो लोगों को नियमित और फरवरी से अप्रैल के व्यस्त सीजन में दो-तीन अतिरिक्त लोगों को दैनिक आधार पर काम मिलता है।
ग्रामीण महिलाएँ जीविका SHG से ऋण कैसे ले सकती हैं?
जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़कर नियमित बचत और बैठकों में भागीदारी के बाद महिलाएँ समूह ऋण के लिए पात्र होती हैं। बड़े व्यावसायिक ऋण के लिए समूह बिहार ग्रामीण बैंक जैसे बैंकों से लिंकेज की सुविधा भी देता है, जैसा ममता देवी के मामले में हुआ।
राष्ट्र प्रेस
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