नए श्रम संहिता से अनुपालन होगा सरल, गिग और असंगठित श्रमिकों को मिलेगा व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवच
सारांश
मुख्य बातें
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और उद्योग विशेषज्ञों ने 24 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित एक संगोष्ठी में स्पष्ट किया कि नए श्रम संहिता (लेबर कोड्स) भारत के श्रम ढाँचे को नियंत्रण-आधारित नियामकीय व्यवस्था से बाहर निकालकर सरकार, उद्योग और श्रमिकों के बीच सहयोग-आधारित प्रणाली की ओर ले जाने का निर्णायक कदम है। विशेषज्ञों के अनुसार नए कोड्स से अनुपालन प्रक्रियाएँ सरल होंगी, रोजगार से जुड़ाव प्रगाढ़ होगा और सामाजिक सुरक्षा का दायरा पूर्व की तुलना में कहीं अधिक व्यापक बनेगा।
संगोष्ठी में मुख्य घटनाक्रम
पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के सचिव चंद्र भूषण कुमार ने बताया कि नए श्रम कोड्स के तहत विभिन्न श्रम कानूनों को समेकित कर व्यवस्था को सरल बनाया गया है। उन्होंने कहा कि प्रावधानों की संख्या घटाई गई है, अनुपालन प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण किया गया है, ई-पोर्टल विकसित किए गए हैं और रिटर्न दाखिल करने की व्यवस्था को एकरूप बनाया गया है। वेतन की परिभाषा को भी अधिक समान और स्पष्ट किया गया है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की संख्या करोड़ों में है और गिग अर्थव्यवस्था तेज़ी से विस्तार पा रही है।
असंगठित और गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा
श्रम सचिव चंद्र भूषण कुमार ने कहा कि नया ढाँचा गिग, प्लेटफॉर्म और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा पहुँचाने के लिए अधिक मज़बूत आधार प्रदान करता है। मंत्रालय डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को जोड़ने पर काम कर रहा है, जिससे लाभ से वंचित श्रमिकों की पहचान कर उनके लिए दीर्घकालिक एवं टिकाऊ श्रम मानक विकसित किए जा सकें। गौरतलब है कि यह भारत की सबसे बड़ी श्रम नीति चुनौतियों में से एक रही है।
316 औद्योगिक जिलों में जागरूकता अभियान
कुमार ने बताया कि मंत्रालय देशभर के 316 औद्योगिक जिलों में जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहा है। राज्यों के श्रम तंत्र और मास्टर ट्रेनर्स को भी नई व्यवस्था के लिए तैयार किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि अधिकांश राज्यों ने अपने नियमों का प्रारूप पहले ही प्रकाशित कर दिया है और फ्लोर वेज (न्यूनतम आधार वेतन) तथा अन्य कार्यान्वयन संबंधी मुद्दों पर स्पष्टता लाने के प्रयास जारी हैं।
इसके अतिरिक्त, नेशनल करियर सर्विस (एनसीएस) और रोजगार एवं कौशल विकास से जुड़े डेटाबेस के एकीकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि नौकरी तलाशने वालों और नियोक्ताओं के बीच बेहतर संपर्क स्थापित हो सके।
उद्योग जगत की राय और चिंताएँ
पीएचडीसीसीआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और महासचिव डॉ. रंजीत मेहता ने कहा कि यदि भारत को विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना है, तो नए श्रम कोड्स के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देना अनिवार्य है। उन्होंने यह भी कहा कि एमएसएमई क्षेत्र के लिए श्रम कानूनों का ढाँचा सरल और सहज-बोध्य होना चाहिए, ताकि वे अत्यधिक कानूनी सलाह पर निर्भर हुए बिना नियमों का पालन कर सकें।
वहीं पीएचडी चैंबर की इकोनॉमीज कमेटी के चेयरमैन आशीष विग ने कहा कि नए श्रम कोड्स को लेकर अभी भी कई उद्योगों में स्पष्टता की आवश्यकता है। उन्होंने माँग की कि इसे पूरी तरह लागू करने से पहले उद्योगों को पर्याप्त तैयारी का समय दिया जाना चाहिए। आलोचकों का कहना है कि कार्यान्वयन की गति और राज्यों के बीच असमान तैयारी इस सुधार की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य और आगे की राह
श्रम सचिव ने यह भी रेखांकित किया कि ग्लोबल साउथ के कई देशों की भारत के श्रम सुधार मॉडल में बढ़ती रुचि देश के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। उनके अनुसार, भारत आधुनिक श्रम पारिस्थितिकी तंत्र के एक सफल उदाहरण के रूप में उभर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि श्रम कोड्स के प्रभावी एवं समयबद्ध क्रियान्वयन से भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को और मज़बूती मिलेगी।