21 सितंबर 2026
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एनएचएआई ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका, आवारा मवेशियों के शेल्टर होम पर ₹7,000 करोड़ खर्च पर जताई आपत्ति

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एनएचएआई ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका, आवारा मवेशियों के शेल्टर होम पर ₹7,000 करोड़ खर्च पर जताई आपत्ति

सारांश

एनएचएआई ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि देशभर में आवारा मवेशियों के लिए शेल्टर होम बनाने का निर्देश मानने में ₹7,000 करोड़ का खर्च होगा और यह ज़िम्मेदारी जिला प्रशासन की होनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने स्पेशल बेंच गठन का निर्देश दिया।

मुख्य बातें

एनएचएआई ने 21 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर आवारा मवेशियों के शेल्टर होम निर्माण के निर्देश पर आपत्ति जताई।
प्राधिकरण के अनुसार इस निर्देश पर अमल करने में लगभग ₹7,000 करोड़ का खर्च आएगा।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि शेल्टर होम बनाना स्थानीय जिला प्रशासन की ज़िम्मेदारी है।
याचिका में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस संजय कुमार की स्पेशल बेंच गठित करने की माँग की गई।
मुख्य न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई के लिए स्पेशल बेंच के गठन का निर्देश दे दिया।
मूल आदेश नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आवारा कुत्तों पर स्वतः संज्ञान लेने के बाद आया था।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने 21 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल कर देशभर में आवारा मवेशियों और कुत्तों के लिए शेल्टर होम निर्माण के निर्देश पर कड़ी आपत्ति जताई है। प्राधिकरण का तर्क है कि इस निर्देश पर अमल करने में करीब ₹7,000 करोड़ का भारी-भरकम खर्च आएगा, जो उसके लिए वहन करना संभव नहीं है।

याचिका में क्या माँगा गया

एनएचएआई की याचिका में स्पेशल बेंच गठित करने की माँग की गई है। याचिका में अनुरोध किया गया है कि जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस संजय कुमार की एक विशेष पीठ इस मामले की सुनवाई करे। प्राधिकरण का मानना है कि शेल्टर होम बनाने की ज़िम्मेदारी एनएचएआई पर नहीं, बल्कि स्थानीय जिला-स्तरीय प्रशासन पर होनी चाहिए।

सॉलिसिटर जनरल की दलील

एनएचएआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामला रखा। उन्होंने कहा, 'एनएचएआई को देशभर में आवारा मवेशियों के लिए शेल्टर होम बनाने का निर्देश दिया गया है, जिसमें लगभग ₹7,000 करोड़ का खर्च आएगा। हमारा कहना है कि यह काम स्थानीय जिला-स्तरीय प्रशासन को करना चाहिए। हम इसे पूरे देश में नहीं कर सकते।'

मुख्य न्यायाधीश ने इस प्रस्तुति के बाद इस मामले की सुनवाई के लिए स्पेशल बेंच के गठन का निर्देश दे दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर स्वतः संज्ञान लिया था। उस आदेश में राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, एनएचएआई और अन्य संबंधित एजेंसियों को निर्देश दिया गया था कि वे राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा मवेशियों और जानवरों को हटाएँ। साथ ही, इन्हें उपयुक्त शेल्टर में रखे जाने और उचित देखभाल सुनिश्चित करने का भी निर्देश था। यह ऐसे समय में आया था जब देशभर में राजमार्गों पर आवारा पशुओं के कारण दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ रही थी।

आम जनता और प्रशासन पर असर

यह विवाद मूलतः यह तय करने का है कि आवारा पशुओं के प्रबंधन की ज़िम्मेदारी किस पर है — राजमार्ग प्राधिकरण पर या स्थानीय शासन पर। एनएचएआई की आपत्ति से यह स्पष्ट होता है कि ₹7,000 करोड़ के संभावित व्यय का बोझ किस पर डाला जाए, यह प्रश्न नीतिगत दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जिला प्रशासन को ज़िम्मेदारी सौंपे जाने पर संसाधन, क्षमता और जवाबदेही के नए सवाल खड़े होंगे।

आगे क्या होगा

मुख्य न्यायाधीश के निर्देश के बाद अब स्पेशल बेंच तय करेगी कि शेल्टर होम निर्माण की ज़िम्मेदारी किसकी है और एनएचएआई की याचिका पर क्या राहत दी जा सकती है। यह फ़ैसला देशभर में आवारा पशु प्रबंधन की नीति को नया आकार दे सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 करोड़ की लागत का हवाला देकर एनएचएआई ने जिला प्रशासन की ओर गेंद फेंकी है, लेकिन स्थानीय निकायों के पास भी अक्सर न तो बजट है, न क्षमता। यह विवाद उस व्यापक प्रवृत्ति को उजागर करता है जहाँ न्यायिक आदेश तो महत्त्वाकांक्षी होते हैं, पर क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी इधर-उधर टाली जाती है। जब तक स्पेशल बेंच यह स्पष्ट नहीं करती कि किस एजेंसी पर कितनी ज़िम्मेदारी है और वित्त का स्रोत क्या होगा, राजमार्गों पर आवारा पशुओं की समस्या और उससे होने वाली दुर्घटनाएँ बेरोकटोक जारी रहेंगी।
RashtraPress
21 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एनएचएआई ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका क्यों दाखिल की?
एनएचएआई ने याचिका दाखिल कर यह आपत्ति जताई है कि देशभर में आवारा मवेशियों के लिए शेल्टर होम बनाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अमल करने में लगभग ₹7,000 करोड़ का खर्च आएगा, जो उसके लिए वहन करना संभव नहीं है। प्राधिकरण का तर्क है कि यह ज़िम्मेदारी स्थानीय जिला प्रशासन की होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं पर पहले क्या आदेश दिया था?
नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों की समस्या पर स्वतः संज्ञान लिया था और राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, एनएचएआई व अन्य एजेंसियों को राष्ट्रीय व राज्य राजमार्गों से आवारा मवेशियों को हटाकर उचित शेल्टर में रखने का निर्देश दिया था।
इस मामले की सुनवाई अब कौन करेगा?
मुख्य न्यायाधीश ने एनएचएआई की प्रस्तुति के बाद स्पेशल बेंच गठन का निर्देश दिया है। याचिका में जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस संजय कुमार की पीठ बनाने की माँग की गई थी।
शेल्टर होम की ज़िम्मेदारी एनएचएआई की है या जिला प्रशासन की?
यही विवाद का केंद्रीय प्रश्न है। एनएचएआई का कहना है कि यह काम जिला-स्तरीय प्रशासन को करना चाहिए, जबकि सर्वोच्च न्यायालय का मूल निर्देश एनएचएआई सहित अन्य एजेंसियों को भी संबोधित था। स्पेशल बेंच ही अंतिम निर्णय करेगी।
इस मामले का आम जनता पर क्या असर पड़ सकता है?
राजमार्गों पर आवारा पशुओं के कारण सड़क दुर्घटनाएँ एक गंभीर समस्या रही हैं। यदि शेल्टर होम बनाने की ज़िम्मेदारी और उसके वित्त पोषण का मामला जल्द नहीं सुलझता, तो यह समस्या बनी रहेगी और देश के लाखों राजमार्ग उपयोगकर्ता जोखिम में रहेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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