ओडिशा में 'शिशु श्रम मुक्त ग्राम पंचायत' अभियान शुरू, 44 दिन चलेगा राज्यव्यापी जागरूकता अभियान
सारांश
मुख्य बातें
ओडिशा सरकार ने 2 अक्टूबर 2026 को गांधी जयंती के अवसर पर 'शिशु श्रम मुक्त ग्राम पंचायत' अभियान का शुभारंभ किया, जो राज्य की प्रत्येक ग्राम पंचायत में 44 दिनों तक चलेगा और जिसका लक्ष्य ओडिशा को बाल श्रम की समस्या से पूरी तरह मुक्त करना है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने एक वीडियो संदेश के माध्यम से इस अभियान का उद्घाटन किया और राज्य की जनता से इसमें सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।
अभियान का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
मुख्यमंत्री माझी ने अपने संदेश में स्पष्ट किया कि बाल श्रम एक गंभीर सामाजिक बुराई है, जो बच्चों और किशोरों को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित करती है। उन्होंने कहा, 'हमारे समाज को बाल श्रम जैसी बुरी प्रथा से मुक्त करना केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हम सभी का सामूहिक दायित्व है।' यह अभियान लोगों में जागरूकता फैलाने के साथ-साथ बाल श्रम उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया है।
मुख्यमंत्री का विज़न: 'समृद्ध ओडिशा'
माझी ने जोर देते हुए कहा कि बच्चों का समग्र विकास 'समृद्ध ओडिशा' के लक्ष्य को हासिल करने की महत्वपूर्ण आधारशिला है। उन्होंने कहा, 'आइए, हम सभी मिलकर बाल श्रम मुक्त ओडिशा के निर्माण के लिए काम करें, जहाँ हर बच्चा सपने देख सके और उन सपनों को पूरा करने के लिए उसे सक्षम बनाया जा सके।' गांधी जयंती पर इस संकल्प की शुरुआत को राज्य सरकार ने प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण बताया है।
ज़मीनी आँकड़ों की चुनौती
गौरतलब है कि ओडिशा में बाल श्रम को लेकर आखिरी विशेष राज्यव्यापी सर्वे 1997 में किया गया था, जिसमें राज्य में 2,15,222 बाल श्रमिकों की पहचान की गई थी। ओडिशा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अनुसार, उस सर्वे के बाद राज्य में बाल श्रम को लेकर कोई व्यवस्थित राज्यव्यापी सर्वे नहीं किया गया है। यह तथ्य इस बात को रेखांकित करता है कि जमीनी स्तर पर बाल श्रम की वर्तमान स्थिति को लेकर सटीक डेटा का अभाव है।
अभियान का दायरा और जन-भागीदारी
यह 44 दिवसीय अभियान ओडिशा की प्रत्येक ग्राम पंचायत तक पहुँचेगा और स्थानीय समुदायों, पंचायत प्रतिनिधियों तथा नागरिक समाज को एक साझे मंच पर लाने की कोशिश करेगा। अभियान का स्वरूप जागरूकता-केंद्रित है, जो यह स्पष्ट करता है कि सरकार केवल प्रशासनिक कार्रवाई के बजाय सामाजिक चेतना को बाल श्रम उन्मूलन का प्राथमिक हथियार मान रही है।
आगे की राह
यह अभियान ऐसे समय में शुरू किया गया है जब राष्ट्रीय स्तर पर भी बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में कई कदम उठाए जा रहे हैं। अभियान की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य में अद्यतन सर्वे के आधार पर कितनी ठोस नीतिगत पहल की जाती है और पंचायत स्तर पर जागरूकता को व्यावहारिक परिणामों में कैसे बदला जाता है।