लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला बोले — सहमति और असहमति जीवंत लोकतंत्र के दो स्तंभ
सारांश
मुख्य बातें
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने 2 नवंबर 2026 को पंचकूला में आयोजित 'जनप्रतिनिधि सम्मेलन' के उद्घाटन सत्र में कहा कि एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र में सहमति और असहमति 'एक ही सिक्के के दो पहलू' हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि असहमति को नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे बेहतर शासन का मार्ग प्रशस्त करने वाले एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
सम्मेलन की पृष्ठभूमि और मुख्य संदर्भ
हरियाणा विधानसभा द्वारा 'संविधान पखवाड़ा' कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित इस 'जनप्रतिनिधि सम्मेलन' में विधानसभा के वर्तमान और पूर्व सदस्य तथा पूर्व मंत्री उपस्थित थे। स्पीकर बिड़ला ने इस मंच से हरियाणा की छह दशकों की विकास यात्रा, उसकी सामाजिक-आर्थिक सुदृढ़ता और विभिन्न क्षेत्रों में राज्य की नेतृत्व क्षमता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने राज्य की उपलब्धियों को भारत के संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक आदर्शों के व्यापक ढाँचे में रखकर देखा।
असहमति का सम्मान — लोकतंत्र की असली परीक्षा
बिड़ला ने रेखांकित किया कि असहमति नए दृष्टिकोण लाती है, प्रशासनिक कमियों को उजागर करती है और बेहतर शासन को प्रोत्साहित करती है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक, दलीय या वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर, सभी जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्च प्रतिबद्धता राज्य और राष्ट्र की निरंतर प्रगति होनी चाहिए। यह संदेश ऐसे समय में आया है जब संसदीय व्यवधान और विपक्ष की भूमिका को लेकर राष्ट्रीय विमर्श तेज है।
हरियाणा की उपलब्धियाँ और संवैधानिक यात्रा
पिछले 60 वर्षों में राज्य की प्रगति की चर्चा करते हुए स्पीकर ने कहा कि ऐतिहासिक और प्रशासनिक चुनौतियों के बावजूद हरियाणा राष्ट्रीय विकास में सदैव अग्रणी रहा है। उन्होंने किसान समुदाय की आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने और देश की खाद्य सुरक्षा में योगदान के लिए सराहना की। सशस्त्र बलों में हरियाणा के युवाओं की असाधारण वीरता और वैश्विक खेल मंचों पर राज्य के खिलाड़ियों के प्रदर्शन की भी उन्होंने विशेष प्रशंसा की।
संविधान — भारत की आत्मा
भारत की संवैधानिक यात्रा के समावेशी स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए बिड़ला ने बताया कि संविधान सभा ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर के मार्गदर्शन में और हरियाणा तथा पंजाब सहित विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं की सक्रिय भागीदारी से, भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के बीच एक सुदृढ़ संसदीय लोकतंत्र की नींव रखी। उन्होंने कहा, 'हमारा संविधान केवल सरकार चलाने का एक ढाँचा नहीं है; यह भारत की आत्मा है, जो हमारी राष्ट्रीय चेतना और करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं को दर्शाती है।'
जनप्रतिनिधियों से आह्वान
स्पीकर बिड़ला ने जनप्रतिनिधियों को स्मरण दिलाया कि जनसेवा के प्रति प्रतिबद्धता विधायिका में कार्यकाल समाप्त होने के साथ खत्म नहीं होती। उन्होंने कानून निर्माताओं से आग्रह किया कि शासन और प्रशासन को महज एक प्रशासनिक तंत्र के रूप में न देखें, बल्कि इन्हें जमीनी स्तर पर जनसशक्तिकरण के साधन के रूप में अपनाएँ। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक और सामाजिक जीवन की असली कसौटी समाज के सबसे कमजोर वर्गों के जीवन में ठोस सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन लाना है।