पापांकुशा एकादशी पर महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती, भांग-गुलाब से सजे बाबा महाकाल
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में पापांकुशा एकादशी (आश्विन शुक्ल पक्ष एकादशी) के पावन अवसर पर गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। अलौकिक दिव्यता के इस क्षण के दर्शन के लिए रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में कतारबद्ध हो गए थे।
मंदिर के पट खुलने की परंपरा
परंपरागत विधि-विधान के अनुसार गुरुवार तड़के सर्वप्रथम भगवान वीरभद्र की आज्ञा ली गई, जिसके पश्चात ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के मध्य बाबा महाकाल के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। मंदिर के कपाट खुलते ही पूरा परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयघोष और घंटियों की ध्वनि से गुंजायमान हो उठा।
जलाभिषेक और पंचामृत से पूजा
कपाट खुलने के उपरांत मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। पूजा के क्रम में प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया और कपूर की आरती के पश्चात बाबा महाकाल ने मुकुट धारण किया।
पापांकुशा एकादशी का विशेष शृंगार
पापांकुशा एकादशी के उपलक्ष्य में बाबा महाकाल का विशेष शृंगार भांग, चंद्र-त्रिपुंड और गुलाब के पुष्पों से किया गया। इस अनूठे श्रृंगार ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के साथ भव्य भस्म आरती संपन्न हुई।
महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा
परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पण के पश्चात बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं — यही विश्वास देशभर से तीर्थयात्रियों को उज्जैन खींच लाता है।
श्रद्धालुओं की आस्था और उपस्थिति
पापांकुशा एकादशी का यह पर्व धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी पर बाबा महाकाल के दर्शन मात्र से समस्त पापों का नाश होता है। यही कारण है कि इस विशेष अवसर पर उज्जैन की ओर श्रद्धालुओं का रेला उमड़ पड़ता है और वे दर्शन पाकर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। आगामी पर्वों पर भी इसी प्रकार की भक्ति और उत्साह के साथ श्रद्धालुओं के उमड़ने की संभावना है।