परिवर्तनी एकादशी पर महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती, भांग शृंगार और राम नाम बेल पत्र से हुई विशेष पूजा
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 22 सितंबर 2026, मंगलवार को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तनी एकादशी के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। इस अलौकिक दृश्य के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। विशेष अवसर पर बाबा महाकाल का भांग से शृंगार किया गया और राम नाम के बेल पत्र अर्पित किए गए।
कपाट खुलते ही गूंजा 'जय श्री महाकाल'
मंगलवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। दिव्य शृंगार और भस्म आरती के पश्चात जैसे ही श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन हुए, पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार की ध्वनि से वातावरण भक्तिमय हो गया।
पंचामृत अभिषेक से हुई पूजा की शुरुआत
मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक किया गया। पूजा के दौरान प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर आरती के उपरांत बाबा ने मुकुट धारण किया, तत्पश्चात झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के साथ भस्म आरती संपन्न कराई गई।
परिवर्तनी एकादशी पर विशेष शृंगार
परिवर्तनी एकादशी के विशेष अवसर पर बाबा महाकाल का भांग से शृंगार किया गया और उन्हें राम नाम के बेल पत्र अर्पित किए गए। यह शृंगार इस तिथि की विशेष धार्मिक मान्यता को दर्शाता है। मंदिर के पुजारी ने महाआरती संपन्न कराई, जिसके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु बीती रात से ही कतारबद्ध थे।
महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा और आस्था
परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के बाद बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं। भस्म आरती के दौरान पुरुष श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।
गौरतलब है कि उज्जैन का श्री महाकालेश्वर मंदिर देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यहाँ की भस्म आरती विश्वभर में अपनी अलौकिकता के लिए प्रसिद्ध है। परिवर्तनी एकादशी जैसे विशेष धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालुओं की आस्था और भी प्रगाढ़ हो जाती है। आने वाले त्योहारी मौसम में मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या में और वृद्धि की संभावना है।