संसदीय वित्त समिति की जल्द बैठक, पश्चिम एशिया संकट के बीच बदलती आर्थिक स्थिति पर होगी चर्चा
सारांश
मुख्य बातें
संसदीय वित्त मामलों की स्थायी समिति पश्चिम एशिया संकट से उपजी वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की बदलती आर्थिक स्थिति पर विचार-विमर्श के लिए इसी महीने के तीसरे सप्ताह में बैठक करने जा रही है। समिति सरकार को नीतिगत सुझाव देने के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट भी तैयार करेगी। लोकसभा बुलेटिन के अनुसार, समिति ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान गहन जाँच के लिए 'देश में बदलती आर्थिक स्थितियाँ' को एक अतिरिक्त विषय के रूप में सम्मिलित किया है।
समिति का एजेंडा और अध्यक्ष का बयान
समिति के अध्यक्ष भर्तृहरि महताब ने कहा, 'गंभीर चुनौतियों के बावजूद, भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूती से उभर रही है। कुछ बहुत अच्छे संकेत भी हैं, जैसे कि पिछले साल की तुलना में परिवारों की बचत में भी बढ़ोतरी हुई है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आर्थिक विकास दर को गति देने के लिए सरकारी निवेश तो बढ़ रहा है, परंतु निजी निवेश में अपेक्षित तेज़ी अभी तक नहीं आई है — यह एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है।
गौरतलब है कि संसदीय समितियाँ अपने गठन के तुरंत बाद चर्चा के विषय तय करती हैं, लेकिन बदलती परिस्थितियों के अनुसार अतिरिक्त विषय जोड़ने का अधिकार भी उनके पास होता है। इस बार पश्चिम एशिया संकट के कारण उत्पन्न वैश्विक दबावों ने समिति को यह अतिरिक्त विषय चुनने पर विवश किया।
RBI की मौद्रिक नीति समिति के मिनट्स: भारत की मज़बूत स्थिति
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के मिनट्स — जो शुक्रवार, 21 जून को जारी किए गए — में स्पष्ट किया गया कि अर्थव्यवस्था के मज़बूत आधार की वजह से भारत पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न कठिनाइयों का सामना करने में सफल रहा है।
MPC सदस्य नागेश कुमार ने कहा, 'पिछले अधिकांश आर्थिक संकटों — जैसे वैश्विक वित्तीय संकट, टेपर टैंट्रम या कोविड-19 — की तुलना में, पश्चिम एशिया संकट के समय भारतीय अर्थव्यवस्था के व्यापक आधार कहीं अधिक मज़बूत थे।' उन्होंने बताया कि फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने से पहले भारत 'गोल्डीलॉक्स मोमेंट' में था — यानी जबरदस्त वृद्धि और बेहद कम मुद्रास्फीति का दुर्लभ संयोग।
विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापार संतुलन
नागेश कुमार के अनुसार, संकट के समय भारत के पास लगभग $700 अरब (करीब 11 महीने के आयात के बराबर) का मज़बूत विदेशी मुद्रा भंडार था। इसके अलावा, बेहतर निर्यात स्थिति और सेवाओं के मज़बूत निर्यात के कारण चालू खाता घाटा भी नियंत्रित स्तर पर बना रहा।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर कई उभरती अर्थव्यवस्थाएँ मुद्रा दबाव और आयात बिल में उछाल से जूझ रही हैं। भारत की यह सापेक्ष स्थिरता नीति-निर्माताओं के लिए राहत का विषय है।
मानसून और कृषि क्षेत्र की स्थिति
MPC मिनट्स में यह भी उल्लेख किया गया कि 10 साल के औसत से 20 प्रतिशत अधिक जल-स्तर वाले बाँधों की स्थिति मानसून की किसी संभावित कमी के असर को कम करने में सहायक हो सकती है। साथ ही, समय के साथ भारतीय कृषि में मानसून की अनिश्चितता से निपटने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार आया है और उस पर इसका प्रभाव पहले की तुलना में घटा है।
आगे की राह
संसदीय वित्त समिति की आगामी बैठक में विशेषज्ञों, मंत्रालय के अधिकारियों और संभवतः RBI प्रतिनिधियों से भी विचार-विमर्श किए जाने की संभावना है। समिति की रिपोर्ट सरकार को नीतिगत दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, विशेषकर निजी निवेश को प्रोत्साहित करने और पश्चिम एशिया संकट के दीर्घकालिक प्रभावों से निपटने के संदर्भ में।