RBI MPC मिनट्स: मजबूत आर्थिक आधार ने भारत को पश्चिम एशिया संकट से बचाया, CPI महंगाई Q3 में 5.9% तक पहुँचने का अनुमान
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 19 जून 2026 को मौद्रिक नीति कमेटी (MPC) की बैठक के मिनट्स जारी किए, जिनमें स्पष्ट किया गया कि देश के सुदृढ़거시आर्थिक आधारों ने पश्चिम एशिया संकट के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़े झटकों से बचाए रखा। MPC सदस्यों ने महंगाई के बढ़ते जोखिम और राजकोषीय गुंजाइश दोनों पर विस्तार से चर्चा की।
मजबूत आधार ने दी राहत
MPC सदस्य नागेश कुमार ने मिनट्स में कहा, 'पिछले ज्यादातर आर्थिक संकटों — जैसे ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस, टेपर टैंट्रम या कोविड-19 — के मुकाबले, पश्चिम एशिया संकट के समय भारतीय अर्थव्यवस्था के व्यापक आधार कहीं अधिक मजबूत थे।' उन्होंने रेखांकित किया कि फरवरी के अंत में टकराव शुरू होने से पहले भारत 'गोल्डीलॉक्स मोमेंट' में था — यानी तेज़ वृद्धि और न्यूनतम महंगाई का दुर्लभ संयोग।
उस समय देश के पास लगभग $700 अरब का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो करीब 11 महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त था। सेवा निर्यात में मज़बूती के चलते चालू खाता घाटा भी संतोषजनक स्तर पर बना रहा। कुमार ने यह भी जोड़ा कि 10 साल के औसत से 20 प्रतिशत अधिक जलस्तर वाले बांध मानसून की संभावित कमी को कुछ हद तक सहने में सहायक हो सकते हैं, और खेती का मानसून पर पारंपरिक निर्भरता घटने से यह जोखिम पहले से कम हुआ है।
राजकोषीय मज़बूती और नीतिगत गुंजाइश
कुमार ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में राजकोषीय अनुशासन पर ध्यान देने से राजकोषीय घाटा 2022-23 के GDP के 6.5 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 4.4 प्रतिशत पर आ गया है। यह सुधार संकट से निपटने के लिए नीतिगत लचीलापन देता है — जिसमें सार्वजनिक निवेश बनाए रखना, निजी खपत में आई कमी की भरपाई करना और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण बढ़ते सब्सिडी बोझ को संभालना शामिल है।
महंगाई का दृष्टिकोण अनिश्चित
RBI ने स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में दीर्घकालिक व्यवधान और दक्षिण-पश्चिम मानसून के वितरण को लेकर अनिश्चितता के चलते मुद्रास्फीति का परिदृश्य अभी भी अस्पष्ट है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) महंगाई मार्च में 3.4 प्रतिशत और अप्रैल में 3.5 प्रतिशत रही, जिसका मुख्य कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी रही। ईंधन महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रही क्योंकि खुदरा कीमतों में वृद्धि का पूरा असर बाज़ार में अभी तक नहीं आया है।
RBI के त्रैमासिक अनुमान के अनुसार CPI महंगाई पहली तिमाही में 4.2 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 5.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
कच्चे तेल और महंगाई का संबंध
MPC सदस्य राम सिंह ने कहा, 'RBI के विश्लेषण से ऊर्जा कीमतों और घरेलू महंगाई के बीच स्पष्ट संबंध उजागर होता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें बेसलाइन से 10 प्रतिशत अधिक रहती हैं और इसका पूरा असर घरेलू उत्पाद कीमतों पर पड़ता है, तो महंगाई लगभग 50 आधार अंक बढ़ सकती है। कच्चे तेल के आयात का बढ़ा बिल चालू खाता घाटे को भी बढ़ाता है।'
अमेरिका-ईरान समझौते से राहत की उम्मीद
गौरतलब है कि अब अमेरिका और ईरान शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके हैं और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों की आवाजाही सामान्य हो गई है। इससे कच्चे तेल की कीमतें गिरकर लगभग $75 प्रति बैरल पर आ गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह स्थिरता बनी रहती है, तो आने वाली तिमाहियों में महंगाई पर दबाव कम हो सकता है और RBI को नीतिगत निर्णय लेने में अधिक लचीलापन मिलेगा।