पश्चिम बंगाल पाठ्यक्रम से सिंगूर-नंदीग्राम अध्याय हटाने के संकेत, भाजपा विधायक सजल घोष का बयान
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल में नई भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार के सत्ता संभालते ही शिक्षा नीति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। बारानगर विधानसभा सीट (उत्तर 24 परगना) से हाल ही में निर्वाचित भाजपा विधायक सजल घोष ने शनिवार, 16 मई को संकेत दिया कि राज्य बोर्ड के स्कूली पाठ्यक्रम से सिंगूर और नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े अध्यायों को हटाया जा सकता है। ये अध्याय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेतृत्व में चले उन आंदोलनों पर आधारित हैं जिन्होंने 2011 में पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन के अंत में निर्णायक भूमिका निभाई थी।
विधायक का बयान और तर्क
सजल घोष, जो कोलकाता नगर निगम में भाजपा पार्षद भी हैं, शनिवार दोपहर एक काउंसलिंग कार्यक्रम में शामिल हुए। कार्यक्रम के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, 'शैक्षणिक जगत के विभिन्न वर्गों से स्कूल पाठ्यक्रम में तत्काल बदलाव की मांग उठी है। नई राज्य सरकार निश्चित रूप से इस मामले पर विचार करेगी।'
घोष ने दावा किया कि सिंगूर भूमि आंदोलन से जुड़े अध्याय में पूर्व शिक्षा मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी की भूमिका का भी उल्लेख है। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस पूर्व मंत्री ने कथित शिक्षक भर्ती घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा गिरफ्तारी के बाद करीब तीन वर्ष जेल में बिताए हों, उनका नाम स्कूली पाठ्यपुस्तक में कैसे बना रह सकता है।
शिक्षा विभाग की स्थिति
घोष ने यह भी बताया कि फिलहाल नए राज्य शिक्षा विभाग के मंत्री के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है और विभाग का कामकाज मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी स्वयं देख रहे हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब नई सरकार ने अभी तक पूर्ण मंत्रिमंडल का गठन नहीं किया है।
सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि हुगली जिले के सिंगूर में टाटा मोटर्स की छोटी कार परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध और पूर्वी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम में इंडोनेशिया स्थित सलीम समूह की प्रस्तावित केमिकल हब परियोजना के खिलाफ ये आंदोलन 2007 में शुरू हुए थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री दिवंगत बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के विरुद्ध तब विपक्ष की नेता रहीं ममता बनर्जी ने इन आंदोलनों का नेतृत्व किया था।
इन आंदोलनों को 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के पतन की प्रमुख वजहों में माना जाता है। 2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी सरकार ने इन आंदोलनों से जुड़े अध्यायों को राज्य बोर्ड के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया था — जो अब विवाद के केंद्र में हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक तनाव चरम पर है। आलोचकों का कहना है कि पाठ्यक्रम से ऐतिहासिक आंदोलनों के अध्याय हटाना शैक्षणिक स्वायत्तता के लिए खतरनाक मिसाल बन सकता है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। नई सरकार का अगला कदम यह तय करेगा कि यह संकेत महज़ राजनीतिक बयानबाज़ी है या पाठ्यक्रम में वास्तविक बदलाव की शुरुआत।