जाति प्रमाण पत्र विवाद: हाई कोर्ट ने मंत्री प्रतिमा बागरी मामले में सरकार को लगाई कड़ी फटकार
सारांश
Key Takeaways
- जबलपुर हाई कोर्ट ने मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र मामले में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई।
- न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अविनेंद्र कुमार सिंह की डबल बेंच ने 20 जून 2025 तक जांच पूरी करने का आदेश दिया।
- कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया कि मंत्री ने राजपूत समाज से होते हुए अनुसूचित जाति का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाया।
- एक साल तक जांच न होने के कारण अहिरवार को हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करनी पड़ी।
- मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार पर जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया गया है।
- अहिरवार ने मांग की है कि दोषी पाए जाने पर मंत्री प्रतिमा बागरी के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए।
भोपाल, 24 अप्रैल। मध्य प्रदेश की नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में उच्च न्यायालय जबलपुर ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए 20 जून 2025 तक जांच पूरी करने का निर्देश दिया है। कांग्रेस के अनुसार, न्यायालय की डबल बेंच ने सरकार से पूछा कि लगभग एक वर्ष से यह जांच क्यों लंबित रखी गई।
क्या है पूरा मामला
करीब एक वर्ष पूर्व कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने उच्च स्तरीय जांच समिति में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मंत्री प्रतिमा बागरी मूलतः सामान्य वर्ग के राजपूत समाज से संबंध रखती हैं, बावजूद इसके उन्होंने अनुसूचित जाति का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर राजनीतिक लाभ उठाया।
शिकायत दर्ज होने के बाद भी जब एक वर्ष तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो प्रदीप अहिरवार ने उच्च न्यायालय जबलपुर में जनहित याचिका दाखिल की।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति अविनेंद्र कुमार सिंह की डबल बेंच ने राज्य सरकार से सीधे सवाल किया कि आखिर इस मामले की जांच को लगभग एक साल तक क्यों दबाए रखा गया।
न्यायालय ने उच्च स्तरीय छानबीन समिति को 60 दिनों यानी दो माह के भीतर जांच पूरी कर निर्णय प्रस्तुत करने का आदेश दिया। 20 जून 2025 तक की समयसीमा निर्धारित की गई है।
कांग्रेस का रुख और आरोप
प्रदीप अहिरवार ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि मंत्री प्रतिमा बागरी अब केवल दो महीने की मंत्री रह गई हैं। उनका दावा है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद जाति प्रमाण पत्र फर्जी साबित होगा और मंत्री को पद से इस्तीफा देना पड़ेगा।
अहिरवार ने मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार पर आरोप लगाया कि वह अधिकारियों और मंत्रियों को बचाने के लिए जांच प्रक्रिया को जानबूझकर धीमा रखती रही। उन्होंने कहा कि छानबीन समिति लगातार दबाव में काम कर रही थी, इसी कारण एक साल बीतने के बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी।
सामाजिक न्याय का सवाल
प्रदीप अहिरवार ने इस मामले को महज राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा बताया। उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति गलत तरीके से अनुसूचित जाति का लाभ लेता है, तो इससे वास्तविक पात्र लोगों के अधिकारों का सीधा हनन होता है।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में जाति प्रमाण पत्र फर्जीवाड़े के मामले नए नहीं हैं। अतीत में भी कई मामलों में न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है। यह प्रकरण इसलिए भी अहम है क्योंकि आरोपी स्वयं एक कैबिनेट स्तरीय मंत्री हैं, जो आरक्षण नीति के दायरे में आकर निर्वाचित हुई हैं।
आगे क्या होगा
उच्च न्यायालय जबलपुर के आदेश के अनुसार, उच्च स्तरीय छानबीन समिति को 20 जून 2025 तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। यदि जांच में जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाया गया, तो मंत्री प्रतिमा बागरी के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ उनकी मंत्री पद की वैधता पर भी सवाल उठेंगे।
अहिरवार ने मांग की है कि न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच सुनिश्चित की जाए और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई हो। यह मामला मध्य प्रदेश की राजनीति में आने वाले हफ्तों में और गर्म होने के आसार हैं।