प्रयागराज: दीपावली पर इको-फ्रेंडली मूर्तियों की ज़बरदस्त मांग, महिला मूर्तिकार रोज़ 13 घंटे कर रहीं काम
सारांश
मुख्य बातें
प्रयागराज में दीपावली 2026 से पहले इको-फ्रेंडली मूर्तियों की मांग इतनी तेज़ी से बढ़ी है कि महिला मूर्तिकार रोज़ाना 12 से 13 घंटे काम करने पर मजबूर हैं। भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर की प्राकृतिक मिट्टी और पानी में घुलने वाले रंगों से बनी ये मूर्तियाँ न केवल प्रयागराज बल्कि दूर-दराज के जिलों में भी भेजी जा रही हैं।
मूर्तियाँ कैसे बनती हैं
महिला मूर्तिकार अनामिका के अनुसार, वह जनवरी माह से ही मूर्तियाँ बनाने का कार्य शुरू कर देती हैं। इस कार्यशाला में गणेश, लक्ष्मी, शुभ-लाभ, सरस्वती, गंगा और हनुमान जी सहित अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तैयार होती हैं। हर देवी-देवता की चार से पाँच अलग-अलग वैरायटी उपलब्ध है — छोटे से लेकर बड़े आकार तक।
रंगों को गोंद में मिलाकर तैयार किया जाता है, जो पूरी तरह सुरक्षित हैं और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते। अनामिका ने स्पष्ट किया कि इन मूर्तियों में किसी भी प्रकार के हानिकारक रसायन का प्रयोग नहीं होता।
बढ़ती मांग और उत्पादन की सीमाएँ
त्योहार के नज़दीक आते ही काम का दबाव कई गुना बढ़ जाता है। अनामिका के अनुसार, मांग इतनी अधिक है कि वे पूरी तरह आपूर्ति कर पाने में असमर्थ हैं। कच्चे माल और समय की कमी के कारण कई ग्राहकों को वापस भी करना पड़ता है।
गौरतलब है कि यह काम सिर्फ परिवार के सदस्यों तक सीमित नहीं है — बाहर से भी अतिरिक्त कारीगर बुलाए जाते हैं, फिर भी हर ऑर्डर पूरा नहीं हो पाता। उत्पादन सीमित रहने के बावजूद मूर्तियाँ प्रयागराज के अलावा अन्य जिलों और दूरदराज के इलाकों में भी भेजी जाती हैं।
दूसरी मूर्तिकार रन्नू की भूमिका
एक अन्य महिला मूर्तिकार रन्नू ने बताया कि यहाँ गणेश-लक्ष्मी के अलावा दुर्गा मैया, काली मैया, बजरंगबली, सरस्वती और कुबेर सहित उन सभी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं जिनकी पूजा दीपावली पर होती है। सभी मूर्तियों को हाथ से सजाया जाता है, जिससे प्रत्येक मूर्ति का अपना अलग आकर्षण होता है।
रन्नू के अनुसार, कई व्यापारी यहाँ से मूर्तियाँ खरीदकर दूर-दूर तक बेचते हैं। मांग हर जगह है और आपूर्ति लगातार बनी रहती है।
पर्यावरण-अनुकूल पहल का महत्त्व
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली रासायनिक मूर्तियों के खिलाफ जागरूकता बढ़ रही है। प्राकृतिक मिट्टी से बनी ये मूर्तियाँ विसर्जन के बाद जल को प्रदूषित नहीं करतीं, जिससे इनकी माँग हर साल बढ़ती जा रही है।
आने वाले वर्षों में यदि उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाए तो ये महिला कारीगर और अधिक बाज़ारों तक अपनी पहुँच बना सकती हैं।