राहुल गांधी की दोहरी रणनीति: छात्र आंदोलन से मुद्दा, गठबंधन से ताकत — UP चुनाव पर नज़र
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इन दिनों दो मोर्चों पर एक साथ सक्रिय हैं — एक ओर जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश, और दूसरी ओर उत्तर प्रदेश समेत आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी गठबंधन को मज़बूत करने की जुगत। इस मुद्दे को उन्होंने संसद से उठाकर संसद मार्ग थाने तक पहुँचाया, जिससे कांग्रेस को लोकतांत्रिक अधिकारों की पैरोकार पार्टी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।
छात्र आंदोलन को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को राहुल गांधी ने आक्रामक तरीके से संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह उठाया है। कांग्रेस का तर्क है कि युवाओं से जुड़े भावनात्मक मुद्दे सरकार-विरोधी जनमत तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
हालाँकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पुलिस बर्बरता के आरोपों को सिरे से खारिज किया है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित पाँच सदस्यीय जाँच समिति का हवाला दिया है। इस समिति के गठन के बाद मामले की न्यायिक निगरानी जारी है।
बिहार से सबक: मुद्दे और गठबंधन दोनों की सीमाएँ
यह ऐसे समय में आया है जब बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति को झटका लग चुका है। राहुल गांधी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था, लेकिन महागठबंधन के सहयोगी दलों ने इस मुद्दे को अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) पहले से अधिक बहुमत के साथ सत्ता में लौटा।
गौरतलब है कि लगातार चुनावी हार ने कांग्रेस के लिए मुद्दे और गठबंधन — दोनों को राजनीतिक अस्तित्व के प्रश्न बना दिया है। पार्टी अपनी ऐतिहासिक विरासत को वोटों में बदलने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रही है।
उत्तर प्रदेश पर केंद्रित रणनीति
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। कभी राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही पार्टी अब क्षेत्रीय दलों और BJP के बीच सीमित भूमिका में सिमट गई है। ऐसे में पार्टी छात्र आंदोलन पर कथित पुलिस कार्रवाई और राम जन्मभूमि ट्रस्ट में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों के ज़रिए अपनी राजनीतिक ज़मीन पुनः मज़बूत करने में जुटी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (SP) के साथ गठबंधन में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन मिला था। अब राहुल गांधी और अखिलेश यादव की संभावित चुनावी साझेदारी सत्ता-विरोधी माहौल, जातीय और सामाजिक समीकरणों के सहारे आगामी चुनावों में बेहतर नतीजों की उम्मीद लगाए हुए है।
गठबंधन समन्वय: बिहार के बाद नया ढाँचा
बिहार के अनुभव से सबक लेते हुए कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ बेहतर तालमेल के लिए समन्वय समितियों के गठन की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसका उद्देश्य सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर अंतिम समय में उभरने वाले विवादों से बचना है।
आने वाले चुनाव कांग्रेस के लिए केवल सीटें जीतने का नहीं, बल्कि लगातार हार की धारणा तोड़ने का भी अवसर माने जा रहे हैं — और इसी दबाव में राहुल गांधी की यह दोहरी रणनीति आकार ले रही है।