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राहुल गांधी की दोहरी रणनीति: छात्र आंदोलन से मुद्दा, गठबंधन से ताकत — UP चुनाव पर नज़र

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राहुल गांधी की दोहरी रणनीति: छात्र आंदोलन से मुद्दा, गठबंधन से ताकत — UP चुनाव पर नज़र

सारांश

राहुल गांधी की रणनीति दो धुरियों पर टिकी है — जंतर-मंतर छात्र आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रतीक में बदलना, और बिहार की हार से सबक लेकर UP में गठबंधन को पहले से मज़बूत करना। लगातार चुनावी नुकसान के बाद कांग्रेस के लिए यह सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि प्रासंगिकता की लड़ाई है।

मुख्य बातें

राहुल गांधी ने जंतर-मंतर पर छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को संसद से संसद मार्ग थाने तक पहुँचाया।
BJP ने पुलिस बर्बरता के आरोप नकारे; सर्वोच्च न्यायालय की पाँच सदस्यीय समिति मामले की जाँच कर रही है।
बिहार चुनाव में SIR मुद्दे को महागठबंधन का समर्थन न मिलने के बाद NDA बढ़े बहुमत से जीता।
2024 लोकसभा में SP के साथ गठबंधन में UP में बेहतर प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव की साझेदारी की संभावना फिर से मज़बूत।
कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ अंतिम समय के विवाद से बचने के लिए समन्वय समितियाँ गठित करने की दिशा में कदम बढ़ाए।

कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी इन दिनों दो मोर्चों पर एक साथ सक्रिय हैं — एक ओर जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश, और दूसरी ओर उत्तर प्रदेश समेत आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी गठबंधन को मज़बूत करने की जुगत। इस मुद्दे को उन्होंने संसद से उठाकर संसद मार्ग थाने तक पहुँचाया, जिससे कांग्रेस को लोकतांत्रिक अधिकारों की पैरोकार पार्टी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

छात्र आंदोलन को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई के मुद्दे को राहुल गांधी ने आक्रामक तरीके से संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह उठाया है। कांग्रेस का तर्क है कि युवाओं से जुड़े भावनात्मक मुद्दे सरकार-विरोधी जनमत तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

हालाँकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पुलिस बर्बरता के आरोपों को सिरे से खारिज किया है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित पाँच सदस्यीय जाँच समिति का हवाला दिया है। इस समिति के गठन के बाद मामले की न्यायिक निगरानी जारी है।

बिहार से सबक: मुद्दे और गठबंधन दोनों की सीमाएँ

यह ऐसे समय में आया है जब बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति को झटका लग चुका है। राहुल गांधी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था, लेकिन महागठबंधन के सहयोगी दलों ने इस मुद्दे को अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) पहले से अधिक बहुमत के साथ सत्ता में लौटा।

गौरतलब है कि लगातार चुनावी हार ने कांग्रेस के लिए मुद्दे और गठबंधन — दोनों को राजनीतिक अस्तित्व के प्रश्न बना दिया है। पार्टी अपनी ऐतिहासिक विरासत को वोटों में बदलने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रही है।

उत्तर प्रदेश पर केंद्रित रणनीति

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। कभी राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही पार्टी अब क्षेत्रीय दलों और BJP के बीच सीमित भूमिका में सिमट गई है। ऐसे में पार्टी छात्र आंदोलन पर कथित पुलिस कार्रवाई और राम जन्मभूमि ट्रस्ट में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों के ज़रिए अपनी राजनीतिक ज़मीन पुनः मज़बूत करने में जुटी है।

2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (SP) के साथ गठबंधन में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन मिला था। अब राहुल गांधी और अखिलेश यादव की संभावित चुनावी साझेदारी सत्ता-विरोधी माहौल, जातीय और सामाजिक समीकरणों के सहारे आगामी चुनावों में बेहतर नतीजों की उम्मीद लगाए हुए है।

गठबंधन समन्वय: बिहार के बाद नया ढाँचा

बिहार के अनुभव से सबक लेते हुए कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ बेहतर तालमेल के लिए समन्वय समितियों के गठन की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसका उद्देश्य सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर अंतिम समय में उभरने वाले विवादों से बचना है।

आने वाले चुनाव कांग्रेस के लिए केवल सीटें जीतने का नहीं, बल्कि लगातार हार की धारणा तोड़ने का भी अवसर माने जा रहे हैं — और इसी दबाव में राहुल गांधी की यह दोहरी रणनीति आकार ले रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

गठबंधन बनाओ, चुनाव जीतो। लेकिन बिहार ने दिखाया कि मुद्दा तब तक काम नहीं करता जब तक सहयोगी दल उसे अपना न मानें। जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन शहरी युवाओं को तो छू सकता है, पर UP के जातीय और ग्रामीण समीकरणों में इसकी पैठ अभी अनिश्चित है। असली परीक्षा यह है कि क्या कांग्रेस इस बार गठबंधन को केवल सीट-बंटवारे का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि साझा विचारधारा की बुनियाद पर खड़ा कर पाती है — जो पिछले कई चुनावों में नहीं हो सका।
RashtraPress
21 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राहुल गांधी जंतर-मंतर छात्र आंदोलन को किस तरह राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं?
राहुल गांधी ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई को संसद में उठाया और संसद मार्ग थाने तक पहुँचकर इसे सार्वजनिक विरोध का रूप दिया। कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे के रूप में पेश कर युवा मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रही है।
BJP ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के आरोपों पर क्या कहा?
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पुलिस बर्बरता के आरोपों से इनकार किया है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित पाँच सदस्यीय जाँच समिति का हवाला दिया है। BJP का कहना है कि मामला न्यायिक निगरानी में है।
बिहार चुनाव में कांग्रेस की रणनीति क्यों विफल रही?
बिहार विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को प्रमुख मुद्दा बनाया, लेकिन महागठबंधन के सहयोगी दलों ने इसे अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। परिणामस्वरूप NDA पहले से अधिक बहुमत के साथ सत्ता में लौटा।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की गठबंधन रणनीति क्या है?
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में UP में बेहतर प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव की संभावित साझेदारी आगामी विधानसभा चुनावों में भी आकार ले सकती है। कांग्रेस सत्ता-विरोधी माहौल और जातीय समीकरणों के सहारे इस गठबंधन को मज़बूत करना चाहती है।
कांग्रेस ने गठबंधन समन्वय के लिए क्या नया कदम उठाया है?
बिहार के अनुभव से सबक लेते हुए कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ समन्वय समितियाँ गठित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसका उद्देश्य सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर अंतिम समय में उभरने वाले विवादों से बचना है।
राष्ट्र प्रेस
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