रांची विधानसभा घेराव: 600 प्रदर्शनकारियों पर FIR, 100 नामजद; 14 पुलिसकर्मी घायल
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड की राजधानी रांची में 10 अगस्त को हुए विधानसभा घेराव के दौरान कथित हिंसा और हंगामे के मामले में पुलिस ने 600 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। विधानसभा थाने में दर्ज इस मामले में 100 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया है, जबकि 500 अज्ञात प्रदर्शनकारियों के खिलाफ भी मुकदमा कायम किया गया है। 13 अगस्त को की गई यह कार्रवाई झारखंड में छात्र आंदोलन के इतिहास की सबसे बड़ी पुलिसिया कार्रवाइयों में से एक मानी जा रही है।
प्राथमिकी में क्या-क्या आरोप
पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बैरिकेड तोड़ने, पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी करने, सरकारी कामकाज में बाधा डालने तथा पुलिस बल पर पथराव करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। झड़प के दौरान 14 से अधिक पुलिसकर्मी और सुरक्षा बल के जवान घायल हुए, जिन्हें चिकित्सा सहायता दी गई।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, पानी की बौछार की और लाठीचार्ज किया। पुलिस का दावा है कि घेराव में शामिल करीब 90 प्रतिशत छात्र शांतिपूर्ण थे, जबकि लगभग 10 प्रतिशत लोगों ने माहौल को उग्र बनाया।
बाहरी उपद्रवियों की भूमिका का दावा
पुलिस अधिकारियों ने दावा किया है कि कुछ बाहरी उपद्रवी वाहनों से प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे और हंगामे को भड़काने का प्रयास किया। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है। यह ऐसे समय में आया है जब छात्र संगठन पुलिस की कार्रवाई को दमनकारी बता रहे हैं।
तकनीक से होगी अज्ञात आरोपियों की पहचान
पुलिस अब नामजद आरोपियों के अलावा अज्ञात प्रदर्शनकारियों की शिनाख्त के लिए वीडियोग्राफी, सीसीटीवी फुटेज और ड्रोन कैमरों से मिले फुटेज की जांच कर रही है। अधिकारियों के अनुसार, जरूरत पड़ने पर फेस रिकॉग्निशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीक का भी उपयोग किया जाएगा।
छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि यह विधानसभा घेराव झारखंड में जारी छात्र आंदोलन की कड़ी में था। छात्र JPSC (झारखंड लोक सेवा आयोग) और JSSC (झारखंड कर्मचारी चयन आयोग) की विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक की जांच CBI से कराने की मांग कर रहे हैं। 10 अगस्त को इन्हीं मांगों को लेकर विधानसभा घेराव का कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
आगे क्या होगा
पुलिस की इस व्यापक कार्रवाई के बाद आंदोलनकारी छात्रों की प्रतिक्रिया और राजनीतिक दलों का रुख महत्वपूर्ण होगा। फेस रिकॉग्निशन तकनीक के इस्तेमाल की घोषणा से नागरिक स्वतंत्रता और निजता के सवाल भी उठ सकते हैं। मामले की आगे की जांच और गिरफ्तारियों पर सबकी नजर बनी रहेगी।