'सहिया' को CBFC ने दूसरी बार प्रमाणन नकारा, निर्देशक संजय शर्मा ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के आदिवासी परिवेश में रची गई हिंदी फीचर फिल्म 'सहिया' एक बार फिर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की आपत्तियों के घेरे में आ गई है। 27 अक्टूबर 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद गठित रिवाइजिंग कमेटी ने फिल्म दोबारा देखने के बावजूद प्रमाणन अस्वीकार करने की सिफारिश कर दी। 29 अक्टूबर को जारी पत्र में फिल्म के कथानक, नक्सलवाद के चित्रण, सुरक्षा बलों की प्रस्तुति और आदिवासी महिलाओं से जुड़े दृश्यों पर नई आपत्तियाँ उठाई गई हैं।
प्रमाणन विवाद का पूरा घटनाक्रम
फिल्म के प्रमाणन के लिए 30 मई 2026 को आवेदन किया गया था। 20 जुलाई को एग्जामिनिंग कमेटी ने फिल्म देखी, इसके बाद मामला रिवाइजिंग कमेटी के पास पहुँचा और 12 अगस्त को सुनवाई हुई। 27 अगस्त को CBFC ने पहली बार प्रमाणन देने से इनकार किया, उस समय देश की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे गंभीर आधार सामने रखे गए थे।
निर्माता की ओर से तैयार कानूनी जवाब में यह भी रेखांकित किया गया कि उस आदेश में किसी एक विशिष्ट दृश्य या संवाद की स्पष्ट पहचान नहीं की गई थी। उल्लेखनीय रूप से, CBFC के उस आदेश में फिल्म का नाम 'सहिया' की जगह 'साहित्य' लिखा गया था। इस निर्णय के विरुद्ध निर्माता ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, जिसके बाद 27 अक्टूबर को रिवाइजिंग कमेटी ने फिल्म दोबारा देखी।
बदलती आपत्तियों पर निर्देशक के सवाल
फिल्म के निर्माता और निर्देशक संजय शर्मा ने इन आपत्तियों को निराधार और फिल्म की मूल भावना के विपरीत बताया। उन्होंने कहा, 'अगर पहली बार फिल्म देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए खतरा थी, तो दूसरी बार वे आरोप कहाँ चले गए? और अगर वे आरोप सही नहीं थे, तो हमारी फिल्म को इतने समय तक क्यों रोका गया?'
शर्मा का तर्क है कि एक ही फिल्म के संबंध में अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग आधार प्रस्तुत करना फिल्म प्रमाणन की पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाता है। उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म निर्माता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी फिल्म में ऐसा कौन-सा ठोस और कानूनी रूप से आपत्तिजनक तत्व है जिसके कारण उसे दर्शकों तक पहुँचने से रोका जा रहा है।
आदिवासी चित्रण और नक्सलवाद पर निर्माता का पक्ष
संजय शर्मा ने CBFC की आदिवासी महिलाओं के चित्रण संबंधी आपत्तियों को अनुचित बताया। उनके अनुसार फिल्म में आदिवासी समाज, उसकी संस्कृति और परंपराओं को पूरे सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया है और आदिवासी महिलाओं को साहसी, स्वाभिमानी और मज़बूत व्यक्तित्व के रूप में दिखाया गया है। फिल्म में पारंपरिक कुरुख और उरांव लोकसंगीत का उपयोग किया गया है और आदिवासी कलाकारों की भागीदारी से इस सांस्कृतिक विरासत को सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। उल्लेखनीय है कि फिल्म के निर्माण में झारखंड सरकार और संबंधित संस्थाओं का सहयोग भी फिल्म के क्रेडिट में दर्ज है।
नक्सलवाद से जुड़ी आपत्तियों पर शर्मा ने कहा कि किसी फिल्म में नक्सल प्रभावित क्षेत्र की पृष्ठभूमि होने या नक्सली पात्रों की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं है कि फिल्म नक्सलवाद का समर्थन करती है। उन्होंने भारतीय सिनेमा की अनेक चर्चित फिल्मों — 'न्यूटन', 'हैदर', 'चक्रव्यूह', 'विसारनई', 'विदुथलाई', 'पान सिंह तोमर', 'सोनचिड़िया' और 'बस्तर: द नक्सल स्टोरी' — का उदाहरण देते हुए कहा कि इन सभी को CBFC से प्रमाणन मिला, जबकि इनमें सामाजिक संघर्ष, हिंसा और सुरक्षा बलों को अलग-अलग दृष्टिकोणों से दिखाया गया है।
कानूनी विकल्प और अदालती कार्यवाही
निर्माता की ओर से प्रस्तुत कानूनी तर्कों में सर्वोच्च न्यायालय और बॉम्बे हाई कोर्ट के अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया गया है, जिनमें यह सिद्धांत रेखांकित किया गया है कि किसी फिल्म का मूल्यांकन उसकी समग्रता में होना चाहिए और किसी पात्र के संवाद को फिल्म निर्माता का व्यक्तिगत विचार नहीं माना जा सकता।
निर्माता ने स्पष्ट किया है कि यदि आवश्यक हो तो फिल्म को 'ए' प्रमाणपत्र या UA 16+ श्रेणी में प्रमाणित किया जा सकता है और फिल्म के प्रारंभ में एक डिस्क्लेमर भी दिया जा सकता है। बॉम्बे हाई कोर्ट में कानूनी कार्यवाही जारी है और निर्माता ने रिवाइजिंग कमेटी की 27 अक्टूबर की सिफारिश को अस्वीकार करने, कमेटी के सदस्यों की रिपोर्ट और बैठक की कार्यवाही से संबंधित दस्तावेज़ उपलब्ध कराने तथा व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देने का अनुरोध किया है।
फिल्म टीम पर असर और आगे की राह
फिल्म 'सहिया' को 18 सितंबर 2026 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ करने की तैयारी थी, लेकिन प्रमाणन विवाद के कारण यह संभव नहीं हो सका। लगातार देरी के कारण फिल्म से जुड़े कलाकारों, संगीतकारों, तकनीशियनों और अन्य सहयोगियों की मेहनत अनिश्चितता में फँसी हुई है।
संजय शर्मा ने कहा, 'फिल्म निर्माता कोई अपराधी नहीं होता कि उसे बार-बार अपनी रचना का औचित्य साबित करना पड़े। हम चाहते हैं कि हमारे साथ न्यायपूर्ण व्यवहार हो और हमें स्पष्ट रूप से बताया जाए कि हमारी फिल्म में कौन-सी ऐसी बात है जिसे कानून के अनुसार प्रदर्शित नहीं किया जा सकता।' बॉम्बे हाई कोर्ट में अगली सुनवाई पर सभी की नज़रें टिकी हैं।