सज्जन कुमार का निधन: 1984 दंगों में उम्रकैद काट रहे कांग्रेस के पूर्व सांसद का 80 वर्ष की आयु में देहांत
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का 20 अगस्त 2026 को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे नई दिल्ली के तिहाड़ जेल में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 14 दिसंबर 2018 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा था।
न्यायिक यात्रा और दोषसिद्धि
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सज्जन कुमार को दिल्ली कैंट और पालम कॉलोनी क्षेत्र में पाँच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाने के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इससे पहले 2013 में उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा उन्हें बरी किए जाने के फैसले को पलट दिया था।
उन्होंने इस दोषसिद्धि को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इस प्रकार सात वर्षों से अधिक समय तक वे तिहाड़ जेल में बंद रहे।
जनकपुरी-विकासपुरी हिंसा के अलग मामले
जनकपुरी और विकासपुरी हिंसा मामले में राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने पहले सज्जन कुमार को बरी कर दिया था, जिसमें दो लोगों की मौत हुई थी। मामले के पुनः उजागर होने के बाद विशेष जाँच दल (SIT) ने फरवरी 2015 में उनके खिलाफ दो अलग एफआईआर दर्ज कीं।
पहली एफआईआर 1 नवंबर 1984 को जनकपुरी में सरदार सोहन सिंह और उनके दामाद अवतार सिंह की हत्या से संबंधित थी। दूसरी एफआईआर 2 नवंबर 1984 को जनकपुरी में सरदार गुरचरण सिंह को जिंदा जलाकर मार डालने की घटना पर दर्ज हुई थी।
अंतिम बयान और जमानत याचिकाएँ
7 जुलाई 2025 को राउज़ एवेन्यू कोर्ट में सज्जन कुमार ने अपना बयान दर्ज कराते हुए कहा था कि वे कभी भी 1984 के सिख विरोधी दंगों में शामिल नहीं थे और उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है। उन्होंने जाँच एजेंसी पर निष्पक्ष जाँच न करने का आरोप भी लगाया था।
27 अप्रैल 2022 को दंगों से जुड़े एक मामले में उन्हें जमानत मिली थी, किंतु दूसरे मामले में दोषसिद्धि के कारण वे जेल में ही रहे। इस वर्ष अप्रैल में उन्होंने अपनी बीमार पत्नी से मिलने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से जमानत माँगी थी, जिसे अदालत ने अस्वीकार कर दिया।
1984 दंगों का ऐतिहासिक संदर्भ
1984 के सिख विरोधी दंगे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के थे, जिनमें हज़ारों सिखों की जान गई थी। दशकों तक न्याय की प्रतीक्षा के बाद सज्जन कुमार की दोषसिद्धि उन मामलों में एक दुर्लभ कानूनी परिणाम था। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया जब पीड़ित परिवार न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे थे।
सज्जन कुमार के निधन के साथ उन मामलों की न्यायिक प्रक्रिया का एक अध्याय समाप्त होता है जो चार दशकों से भारतीय राजनीति और न्याय व्यवस्था दोनों को कठघरे में खड़ा करते रहे। उनसे जुड़े शेष मामलों की आगे की कानूनी स्थिति अदालतों द्वारा तय की जाएगी।