सावन पूर्णिमा पर सरयू घाट पर उमड़े लाखों श्रद्धालु, अयोध्या में शिव आराधना और रक्षाबंधन की धूम
सारांश
मुख्य बातें
अयोध्या में सावन पूर्णिमा के अवसर पर 28 अगस्त, गुरुवार की सुबह से ही सरयू नदी के घाटों पर श्रद्धालुओं का अपार जनसैलाब उमड़ पड़ा। भक्तों ने पवित्र सरयू में स्नान कर भगवान शिव की पूजा-अर्चना की और सुख-समृद्धि तथा निरोगी जीवन की कामना की। सावन के इस अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर आस्था और उल्लास का संगम देखने को मिला।
सावन पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
सावन का महीना भगवान भोलेनाथ की आराधना के लिए सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। पूरे माह शिव भक्त मंदिरों में पहुँचकर जलाभिषेक करते हैं और व्रत-उपासना में लीन रहते हैं। सावन पूर्णिमा इस धार्मिक माह का सबसे विशेष दिन होता है। अयोध्या में श्रद्धालुओं ने सरयू स्नान के पश्चात मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित किया और विधि-विधान से पूजा-पाठ किया।
पुजारी का कथन — मनोकामना पूर्ति की मान्यता
एक स्थानीय पुजारी ने बताया कि सावन पूर्णिमा भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखती है। उन्होंने कहा, 'पिछले एक महीने से श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ को जल चढ़ा रहे हैं और शिव की आराधना में जुटे हैं।' मान्यता है कि सावन में श्रद्धा और विधि-विधान से जलाभिषेक करने से भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
रक्षाबंधन और पौराणिक कथा
पुजारी ने यह भी बताया कि सावन पूर्णिमा के दिन धार्मिक आस्था के साथ-साथ रक्षाबंधन का पर्व भी मनाया जाता है। भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का यह त्योहार देशभर में उत्साह के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन माता लक्ष्मी ने एक गरीब स्त्री का वेश धारण कर राजा बलि को राखी बाँधी थी — यह कथा इस पर्व की गहरी आध्यात्मिक जड़ों को दर्शाती है।
बिहार के बांका में भी भक्तों की भीड़
बिहार के बांका में भी सावन पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई। वहाँ के प्रसिद्ध शिव मंदिर में बड़ी संख्या में भक्त भगवान भोलेनाथ को जल चढ़ाने पहुँचे। सुबह से ही मंदिर परिसर में आस्था का सैलाब उमड़ा रहा और भक्तों ने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना की।
आगे क्या
सावन पूर्णिमा के साथ ही सावन माह का समापन होता है, लेकिन भक्तों की आस्था वर्षभर बनी रहती है। अयोध्या जैसे तीर्थ स्थलों पर ऐसे धार्मिक आयोजन न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बनते हैं।