24 अगस्त 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने करीमगंज चुनाव याचिका पर गुवाहाटी हाईकोर्ट का आदेश पलटा, मामला वापस भेजा

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सुप्रीम कोर्ट ने करीमगंज चुनाव याचिका पर गुवाहाटी हाईकोर्ट का आदेश पलटा, मामला वापस भेजा

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने करीमगंज लोकसभा सीट पर गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी हाफिज रशीद अहमद चौधरी की चुनाव याचिका शुरुआत में ही खारिज की गई थी। फॉर्म-25 सत्यापन और प्रतिलिपि अनुप्रमाणन पर महत्वपूर्ण व्याख्या देते हुए शीर्ष अदालत ने मामला उच्च न्यायालय को वापस भेजा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अगस्त 2026 को गुवाहाटी उच्च न्यायालय का वह आदेश रद्द किया जिसमें करीमगंज चुनाव याचिका खारिज की गई थी।
कांग्रेस के पराजित प्रत्याशी हाफिज रशीद अहमद चौधरी की अपील न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.
विनोद चंद्रन की पीठ ने स्वीकार की।
BJP के कृपानाथ मल्लाह ने 2024 के लोकसभा चुनाव में चौधरी को 18,360 मतों से हराया था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 83 के तहत कमी के आधार पर धारा 86 के अंतर्गत याचिका अनिवार्यतः खारिज नहीं की जा सकती।
याचिका में 47 मतदान केंद्रों पर बूथ कैप्चरिंग, रिश्वतखोरी और मतदाताओं को डराने के आरोप शामिल हैं।
मामला अब गुवाहाटी उच्च न्यायालय में फॉर्म-25 सत्यापन की जाँच के साथ पुनः सुनवाई के लिए भेजा गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अगस्त 2026 को असम की करीमगंज लोकसभा सीट से जुड़े चुनाव विवाद में अहम हस्तक्षेप करते हुए गुवाहाटी उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कांग्रेस के पराजित प्रत्याशी हाफिज रशीद अहमद चौधरी की चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने चौधरी की अपील स्वीकार करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए उच्च न्यायालय को वापस लौटा दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

2024 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार कृपानाथ मल्लाह ने करीमगंज संसदीय क्षेत्र से चौधरी को 18,360 मतों के अंतर से पराजित किया था। इसके बाद चौधरी ने उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दाखिल की, जिसमें धांधली, 47 मतदान केंद्रों पर बूथ कैप्चरिंग, मतदाताओं को डराने-धमकाने और रिश्वतखोरी जैसे भ्रष्ट आचरण के गंभीर आरोप लगाए गए थे। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 86 के अंतर्गत इस याचिका को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने तीन प्रमुख आपत्तियों की विस्तृत जाँच की — याचिका की प्रतियों का सत्यापन, फॉर्म-25 हलफनामे की स्थिति, और याचिका के चार पन्नों के कथित रूप से गायब होने का प्रश्न।

सत्यापन के मुद्दे पर अदालत ने स्पष्ट किया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 81(3) के तहत सत्यापन का कोई निश्चित तरीका अनिवार्य नहीं है। पीठ ने कहा कि प्रत्येक पृष्ठ के नीचे याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर — जिनसे वे प्रतिलिपि की प्रामाणिकता की जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं — पर्याप्त माने जाएंगे। अदालत ने यह भी कहा कि 'असली प्रतिलिपि के रूप में सत्यापित' और 'असली प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित' जैसे वाक्यांशों का अर्थ एक ही है।

पीठ ने 'एफए सापा बनाम सिंगोरा' के निर्णय का हवाला देते हुए कहा, 'हम उस फैसले में दिए गए निष्कर्षों से सम्मानपूर्वक सहमत हैं और विवादित निर्णय में इसके विपरीत दिए गए निष्कर्ष को पलटते हैं, क्योंकि इस्तेमाल किए गए अलग-अलग रबर स्टैम्प का अर्थ एक ही है।'

फॉर्म-25 और सत्यापन का प्रश्न

अदालत ने फॉर्म-25 से जुड़ी कमी के संदर्भ में संविधान पीठ के पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया और स्पष्ट किया कि इस कमी के आधार पर धारा 86 के तहत पूरी चुनाव याचिका को अनिवार्य रूप से खारिज नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा, 'जाहिर है, धारा 83 के तहत कमी होने पर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 86 के तहत याचिका को अनिवार्य रूप से खारिज नहीं किया जा सकता।'

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मूल दस्तावेज में फॉर्म-25 को 'कमिश्नर ऑफ एफिडेविट्स' के समक्ष पुष्टि की गई थी। उच्च न्यायालय को निर्देश दिया गया कि वह जाँचे कि मूल दस्तावेज में शपथ पर पुष्टि का उचित सत्यापन मौजूद है या नहीं।

उच्च न्यायालय को निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय को स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि शपथ पर पुष्टि का उचित सत्यापन मौजूद है, तो मामले की गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ा जाए। यदि सत्यापन नहीं है, तो भ्रष्ट आचरण के आरोपों पर बहस की अनुमति न दी जाए, किंतु अन्य आधारों पर गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाए।

हालाँकि, चार पन्नों के गायब होने के प्रश्न पर शीर्ष अदालत ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निष्कर्ष को सही ठहराया और कहा कि उसमें हस्तक्षेप की कोई वजह नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने चुनाव याचिका में लगाए गए मुख्य आरोपों की सत्यता पर कोई निर्णय नहीं सुनाया है।

आगे क्या होगा

मामला अब गुवाहाटी उच्च न्यायालय में पुनः सुनवाई के लिए जाएगा, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार फॉर्म-25 सत्यापन की जाँच के बाद यह तय होगा कि भ्रष्ट आचरण के आरोपों पर सुनवाई होगी या नहीं। BJP सांसद कृपानाथ मल्लाह के चुनाव को चुनौती देने वाली यह याचिका अब विधिवत प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
RashtraPress
24 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने करीमगंज चुनाव याचिका मामले में क्या फैसला दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी हाफिज रशीद अहमद चौधरी की चुनाव याचिका प्रारंभिक स्तर पर खारिज की गई थी। मामला अब पुनर्विचार के लिए उच्च न्यायालय को वापस भेजा गया है।
करीमगंज चुनाव याचिका में क्या आरोप लगाए गए थे?
याचिका में 2024 के लोकसभा चुनाव में 47 मतदान केंद्रों पर बूथ कैप्चरिंग, मतदाताओं को डराने-धमकाने, रिश्वतखोरी और धांधली जैसे भ्रष्ट आचरण के आरोप लगाए गए थे। ये आरोप BJP सांसद कृपानाथ मल्लाह के चुनाव के विरुद्ध हैं।
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका क्यों खारिज की थी?
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 86 के तहत याचिका को प्रारंभिक चरण में खारिज किया था। उच्च न्यायालय ने याचिका की प्रतियों के सत्यापन और फॉर्म-25 हलफनामे से जुड़ी तकनीकी खामियों को आधार बनाया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने फॉर्म-25 और सत्यापन के बारे में क्या कहा?
अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 81(3) के तहत सत्यापन का कोई निश्चित तरीका अनिवार्य नहीं है और याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर पर्याप्त हैं। साथ ही, फॉर्म-25 की कमी के आधार पर पूरी याचिका को धारा 86 के तहत अनिवार्यतः खारिज नहीं किया जा सकता।
अब करीमगंज चुनाव याचिका मामले में आगे क्या होगा?
गुवाहाटी उच्च न्यायालय अब फॉर्म-25 के मूल दस्तावेज में सत्यापन की जाँच करेगा। यदि उचित सत्यापन मिलता है तो भ्रष्ट आचरण के आरोपों पर सुनवाई होगी; अन्यथा अन्य आधारों पर गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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