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सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल अभ्यर्थी की उम्मीदवारी बहाल की, लोक अदालत समझौते को अपराध स्वीकृति नहीं माना

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सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल अभ्यर्थी की उम्मीदवारी बहाल की, लोक अदालत समझौते को अपराध स्वीकृति नहीं माना

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत में समझौता अपराध की स्वीकृति नहीं है। तेलंगाना पुलिस भर्ती बोर्ड द्वारा एक असफल प्रेम संबंध से जुड़े पुराने मामले के आधार पर उम्मीदवारी रद्द करना मनमाना करार दिया गया और अभ्यर्थी गजुल थिरुपति की नियुक्ति पर पुनर्विचार का आदेश दिया गया।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 8 जून को गजुल थिरुपति की तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल उम्मीदवारी बहाल करने का आदेश दिया।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय की डिवीज़न बेंच का आदेश रद्द किया।
थिरुपति पर IPC धारा 417, 420 और 506 के तहत दर्ज मामला 2015 में लोक अदालत में समझौते से निपटाया गया था।
न्यायालय ने कहा कि लोक अदालत समझौता अपराध स्वीकृति के समान नहीं है और इसे अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
तेलंगाना पुलिस भर्ती बोर्ड को अब एकल न्यायाधीश के निर्देशानुसार नियुक्ति पर पुनर्विचार करना होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 8 जून को तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती में गजुल थिरुपति की उम्मीदवारी बहाल करने का निर्णय सुनाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने एक ऐसे आपराधिक मामले के आधार पर नियुक्ति अस्वीकार कर मनमाना रवैया अपनाया, जो एक असफल प्रेम संबंध से उत्पन्न हुआ था और 2015 में लोक अदालत में समझौते के ज़रिये निपटाया जा चुका था।

मुख्य घटनाक्रम

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय की डिवीज़न बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें 'स्टाइपेंडरी कैडेट ट्रेनिंग पुलिस कांस्टेबल' (SCTPC) पद के लिए थिरुपति के अस्थायी चयन को निरस्त किए जाने को उचित ठहराया गया था। इसके साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को पुनर्स्थापित किया, जिसमें अभ्यर्थी की नियुक्ति पर पुनर्विचार का निर्देश दिया गया था।

थिरुपति पर पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 417, 420 और 506 (धारा 34 के साथ) के तहत मामला दर्ज हुआ था। एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसने विवाह का वादा किया और बाद में किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। यह मामला 2015 में लोक अदालत में समझौते से समाप्त हो गया था। इसके बावजूद भर्ती बोर्ड ने उनका प्रोविज़नल सिलेक्शन रद्द कर दिया था।

न्यायालय की टिप्पणियाँ

जस्टिस मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने कहा, "राज्य और उसके अधिकारी मनमाने ढंग से काम नहीं कर सकते।" न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी बरी या मुक्त हो चुके उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन करने के लिए रिकॉर्ड पर यह दर्शाना अनिवार्य है कि वास्तव में नैतिक अधमता वाला अपराध किया गया था और उम्मीदवार के विरुद्ध ठोस सामग्री उपलब्ध है।

पीठ ने भर्ती अधिकारियों की इस दलील को भी सिरे से खारिज किया कि लोक अदालत में हुआ समझौता अपराध स्वीकार करने के समान है। न्यायालय ने कहा, "यह कहना कि समझौते का मतलब अपराध स्वीकार करना है, बिना किसी आधार के है। इसके अलावा, यह कहना कि अपीलकर्ता ने समझौता इसलिए किया क्योंकि वह दोषी था, पूरी तरह से गलत और तर्कहीन है।"

प्रेम संबंध और चरित्र निर्धारण पर न्यायालय का रुख

सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि यह प्रकरण दो वयस्कों के बीच के संबंध से जुड़ा था। न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों को केवल इसी आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में नकारात्मक निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। पीठ ने यह भी जोड़ा कि हर प्रेम संबंध विवाह तक नहीं पहुँचता और केवल इसलिए कि संबंध विवाह में नहीं बदला, यह नहीं माना जा सकता कि एक पक्ष ने दूसरे के साथ धोखाधड़ी की।

गौरतलब है कि न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि थिरुपति ने अपने आवेदन में आपराधिक मामले की पूरी और सही जानकारी दी थी, और तथ्य छिपाने का कोई आरोप नहीं था।

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड को एकल न्यायाधीश के निर्देश के अनुसार थिरुपति की नियुक्ति पर पुनर्विचार करना होगा। यह निर्णय उन सभी सरकारी भर्तियों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर बन सकता है, जहाँ समझौता-निपटान वाले पुराने मामलों को अयोग्यता का आधार बनाया जाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें लोक अदालत के समझौतों को चुपचाप 'दोष-स्वीकृति' की तरह इस्तेमाल किया जाता है। भर्ती बोर्डों के पास विवेकाधिकार है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह विवेक साक्ष्य-आधारित होना चाहिए, न कि नैतिक अनुमानों पर टिका। असली सवाल यह है कि क्या राज्य भर्ती एजेंसियाँ इस नज़ीर को आत्मसात करेंगी, या अगली बार फिर किसी अभ्यर्थी को वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद न्याय मिलेगा।
RashtraPress
7 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने गजुल थिरुपति के मामले में क्या फैसला दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 8 जून को गजुल थिरुपति की तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल उम्मीदवारी बहाल करने का आदेश दिया और तेलंगाना उच्च न्यायालय की डिवीज़न बेंच का फैसला रद्द कर दिया। न्यायालय ने भर्ती बोर्ड के निर्णय को मनमाना करार दिया।
क्या लोक अदालत में समझौता करना अपराध स्वीकार करना माना जाएगा?
नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत में समझौता अपराध की स्वीकृति नहीं है और इसे सरकारी नौकरी में अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने इस दलील को 'बिना किसी आधार के' और 'तर्कहीन' बताया।
थिरुपति पर कौन-सा आपराधिक मामला दर्ज था?
उन पर IPC की धारा 417, 420 और 506 (धारा 34 के साथ) के तहत मामला दर्ज हुआ था। एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसने विवाह का वादा कर बाद में किसी अन्य से विवाह कर लिया। यह मामला 2015 में लोक अदालत में समझौते से निपटाया गया था।
सरकारी भर्ती में बरी हो चुके उम्मीदवार की उपयुक्तता कैसे आँकी जाए?
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, नियोक्ता बरी या मुक्त हो चुके उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए रिकॉर्ड पर यह दर्शाना ज़रूरी है कि नैतिक अधमता वाला अपराध वास्तव में हुआ था और उम्मीदवार के विरुद्ध ठोस सामग्री उपलब्ध है।
इस फैसले का असर अन्य सरकारी भर्तियों पर क्या पड़ेगा?
यह निर्णय उन सभी सरकारी भर्तियों के लिए महत्वपूर्ण नज़ीर बन सकता है, जहाँ पुराने समझौता-निपटान मामलों को अयोग्यता का आधार बनाया जाता है। भर्ती एजेंसियों को अब मनमाने निर्णयों के बजाय साक्ष्य-आधारित आकलन करना होगा।
राष्ट्र प्रेस
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