बलवंत सिंह राजोआना से पटियाला जेल में मिले एसजीपीसी प्रमुख धामी, 13 साल से लंबित दया याचिका पर चर्चा
सारांश
मुख्य बातें
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी और अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गरगज ने 29 सितंबर को पटियाला सेंट्रल जेल में मौत की सजा पाए कैदी बलवंत सिंह राजोआना से मुलाकात की। इस बैठक में राजोआना की केंद्र सरकार के पास लंबित दया याचिका और देशभर की जेलों में बंद सिख कैदियों — जिन्हें 'बंदी सिंह' कहा जाता है — के व्यापक मुद्दे पर चर्चा हुई।
मुलाकात में क्या हुआ
बैठक के बाद धामी ने मीडिया के सामने राजोआना का संदेश साझा किया। राजोआना के हवाले से उन्होंने कहा, 'मेरा हौसला बुलंद है और मैं अपमान सहने के बजाय शहादत को चुनूंगा।' यह बयान राजोआना के उस दृढ़ रुख को दर्शाता है जो वे वर्षों से अपनाए हुए हैं।
गौरतलब है कि यह कोई पहली मुलाकात नहीं है — मई 2025 में भी धामी ने पटियाला जेल में राजोआना से मुलाकात की थी और उस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि दया याचिका पर निर्णय न लेना अनुचित है। उन्होंने यह भी बताया था कि राजोआना चाहते हैं कि एसजीपीसी याचिका वापस लेकर तत्काल फैसले के लिए दबाव बनाए।
राजोआना का मामला: पृष्ठभूमि
बलवंत सिंह राजोआना को पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की 1995 में हुई हत्या में भूमिका के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी। राजोआना ने तब से जेल में 30 वर्ष से अधिक समय बिताया है।
उनकी सजा को उम्रकैद में बदलने के लिए एसजीपीसी ने मार्च 2012 में संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत दया याचिका दायर की थी। यह याचिका तब से केंद्र सरकार के पास विचाराधीन है — यानी 13 वर्षों से अधिक समय से कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है।
राजोआना का प्रधानमंत्री को पत्र
इसी महीने, राजोआना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी दया याचिका पर शीघ्र निर्णय लेने का आग्रह किया। 16 सितंबर के इस पत्र में उन्होंने सवाल उठाया कि तीन दशक जेल में बिताने के बाद भी केंद्र सरकार ने उनकी अर्जी पर कोई फैसला क्यों नहीं लिया।
राजोआना ने गुरु नानक देव की 550वीं जयंती के अवसर पर 2019 में जारी एक सरकारी अधिसूचना का भी उल्लेख किया, जिसे उनके अनुसार आज तक लागू नहीं किया गया है।
सिख संगठनों की माँग और व्यापक संदर्भ
यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब सिख धार्मिक संगठन 'बंदी सिंह' — अर्थात लंबे समय से जेलों में बंद सिख कैदियों — की रिहाई के लिए लगातार अभियान चला रहे हैं। एसजीपीसी ने केंद्र सरकार से बार-बार अपील की है कि वह राजोआना की दया याचिका पर निर्णय ले, क्योंकि इतनी लंबी अनिश्चितता स्वयं राजोआना के लिए कष्टकारी बन चुकी है।
आलोचकों का कहना है कि किसी भी दया याचिका पर दशकों तक निर्णय न लेना न केवल संवैधानिक भावना के विरुद्ध है, बल्कि यह पंजाब में सिख समुदाय की भावनाओं को भी प्रभावित करता है।
आगे क्या होगा
फिलहाल राजोआना की दया याचिका केंद्र सरकार के विचाराधीन बनी हुई है। एसजीपीसी और अकाल तख्त का दबाव बढ़ता जा रहा है, और राजोआना के प्रधानमंत्री को लिखे पत्र के बाद यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा में आ गया है। अब देखना यह होगा कि केंद्र सरकार इस पर कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं।