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गजेंद्र शेखावत: 2014 के बाद शासन पर जनता का भरोसा बढ़ा; तुहिन सिन्हा ने अर्बन नक्सल विचारधारा पर साधा निशाना

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गजेंद्र शेखावत: 2014 के बाद शासन पर जनता का भरोसा बढ़ा; तुहिन सिन्हा ने अर्बन नक्सल विचारधारा पर साधा निशाना

सारांश

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र शेखावत ने 2014 के बाद शासन पर जनता के बढ़ते भरोसे का दावा किया, जबकि तुहिन सिन्हा ने अर्बन नक्सल विचारधारा और UPA दौर की नीतियों पर तीखे सवाल उठाए — दोनों बयान एक ही दिन, एक ही मंच से।

मुख्य बातें

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने 25 मई 2026 को कहा कि 2014 के बाद शासन व्यवस्था पर जनता का भरोसा मज़बूत हुआ है।
शेखावत के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में भारत ने महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं।
सिन्हा ने दावा किया कि 2010 के आसपास नक्सलवाद की हिंसा अपने चरम पर थी।
सिन्हा ने UPA सरकार के एक सलाहकार निकाय पर अर्बन नक्सल विचारधारा से जुड़े लोगों को शामिल करने का आरोप लगाया — इन दावों पर विरोध भी दर्ज होता रहा है।
सिन्हा ने डिजिटल राजनीतिक प्लेटफ़ॉर्म की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए।

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने 25 मई 2026 को नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि 2014 के बाद भारत में शासन व्यवस्था के प्रति जनता का भरोसा उल्लेखनीय रूप से मजबूत हुआ है और देश 'विकसित भारत' के लक्ष्य की दिशा में तेज़ी से अग्रसर है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में देश ने अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे हैं, जो भारत के भविष्य की दृष्टि से अत्यंत निर्णायक रहे हैं।

शेखावत का शासन पर बयान

शेखावत ने कहा कि 2014 से पहले शासन व्यवस्था को लेकर जनता में अविश्वास का माहौल व्याप्त था। उनके अनुसार, पिछले वर्षों में सरकार की नीतियों और ठोस प्रयासों के कारण आम नागरिकों का संस्थाओं पर भरोसा बहाल हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि आज भारत चुनौतियों को केवल झेल नहीं रहा, बल्कि उन्हें अवसरों में रूपांतरित कर एक सशक्त अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।

तुहिन सिन्हा का अर्बन नक्सल पर रुख

इसी अवसर पर तुहिन ए. सिन्हा ने पत्रकारों के समक्ष कहा कि देश में 'अर्बन नक्सल' की विचारधारा लंबे समय से सक्रिय रही है और समय-समय पर इसने समाज एवं संस्थाओं को प्रभावित करने की कोशिश की है। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2010 के आसपास नक्सलवाद की हिंसा अपने चरम पर थी, जिससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे।

सिन्हा ने कहा कि कुछ शहरी इलाकों और विश्वविद्यालय परिसरों में इस विचारधारा को समर्थन देने वाले समूह सक्रिय रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के दौरान एक सलाहकार निकाय गठित किया गया था, जिस पर इस विचारधारा से जुड़े व्यक्तियों को शामिल करने के आरोप लगते रहे। हालाँकि, इन आरोपों पर विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से समय-समय पर कड़ा विरोध दर्ज कराया जाता रहा है।

सुरक्षा अभियानों और न्यायिक निर्णयों पर टिप्पणी

सिन्हा ने कहा कि नक्सलवाद-विरोधी अभियानों और नीतियों को उस दौर में अपेक्षित राजनीतिक समर्थन नहीं मिला, जिससे सुरक्षा बलों के प्रयासों पर प्रतिकूल असर पड़ा। उन्होंने कुछ न्यायिक निर्णयों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उस कालखंड में सरकार की रणनीति कमज़ोर रही। उनके अनुसार, कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं ने इस विचारधारा को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन दिया — यद्यपि इन दावों पर संबंधित पक्षों की ओर से खंडन भी सामने आता रहा है।

डिजिटल राजनीति और लोकतांत्रिक विमर्श पर चिंता

सिन्हा ने यह भी कहा कि कुछ ऑनलाइन राजनीतिक प्लेटफ़ॉर्म और समूहों की संरचना एवं गतिविधियों को लेकर पारदर्शिता का अभाव देखा जाता है। उन्होंने चेताया कि राजनीति को सोशल मीडिया पर सतही तरीके से प्रस्तुत करने से गंभीर लोकतांत्रिक विमर्श कमज़ोर हो सकता है। उनके अनुसार, राजनीतिक आंदोलनों और विचारों को जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मज़बूती के लिए अनिवार्य है।

एकजुटता और विकास का आह्वान

सिन्हा ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि भारत को वैचारिक रूप से एकजुट रहकर हर प्रकार की चरमपंथी और विभाजनकारी सोच के विरुद्ध खड़ा होना होगा। उनके अनुसार, स्थिरता, विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करना ही देश को आगे ले जाने का सबसे सटीक मार्ग है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में राजनीतिक विमर्श और राष्ट्रीय सुरक्षा नीति पर बहस तेज़ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो 2014 को एक निर्णायक विभाजन-रेखा के रूप में स्थापित करती है। 'अर्बन नक्सल' का आरोप कोई नया नहीं है — यह शब्द विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और शिक्षाविदों पर भी लगाया जाता रहा है, जो इसकी परिभाषा और दायरे को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। UPA सलाहकार निकाय पर लगाए गए आरोप पुराने और विवादित हैं; इन्हें बिना साक्ष्य के दोहराना पत्रकारिता की कसौटी पर जाँचने की माँग करता है। लोकतांत्रिक विमर्श की रक्षा का आह्वान तब अधिक विश्वसनीय होता, जब इसके साथ असहमति की जगह और नागरिक स्वतंत्रता की भी उतनी ही मज़बूत पैरोकारी होती।
RashtraPress
9 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गजेंद्र सिंह शेखावत ने 2014 के बाद शासन व्यवस्था को लेकर क्या कहा?
शेखावत ने कहा कि 2014 से पहले शासन व्यवस्था पर जनता में अविश्वास था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में सरकारी नीतियों के कारण यह भरोसा मज़बूत हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत अब चुनौतियों को अवसरों में बदल रहा है।
तुहिन सिन्हा ने अर्बन नक्सल विचारधारा पर क्या आरोप लगाए?
सिन्हा ने दावा किया कि अर्बन नक्सल विचारधारा लंबे समय से शहरी इलाकों और विश्वविद्यालय परिसरों में सक्रिय रही है। उन्होंने UPA सरकार के एक सलाहकार निकाय पर इस विचारधारा से जुड़े लोगों को शामिल करने का आरोप लगाया, हालाँकि इन दावों पर संबंधित पक्षों की ओर से विरोध भी दर्ज होता रहा है।
नक्सलवाद की हिंसा किस वर्ष अपने चरम पर थी?
तुहिन सिन्हा के अनुसार, वर्ष 2010 के आसपास नक्सलवाद की हिंसा अपने चरम पर थी, जिससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे। उन्होंने कहा कि उस दौर में नक्सल-विरोधी अभियानों को पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं मिला।
सिन्हा ने डिजिटल राजनीति को लेकर क्या चिंता जताई?
सिन्हा ने कहा कि कुछ ऑनलाइन राजनीतिक प्लेटफ़ॉर्म और समूहों की गतिविधियों में पारदर्शिता का अभाव है। उनके अनुसार, राजनीति को सोशल मीडिया पर सतही तरीके से प्रस्तुत करने से गंभीर लोकतांत्रिक विमर्श कमज़ोर होता है।
'विकसित भारत' के लक्ष्य को लेकर शेखावत ने क्या कहा?
शेखावत ने कहा कि भारत तेज़ी से 'विकसित भारत' बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और देश एक सशक्त अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है। उन्होंने मोदी सरकार के 12 वर्षों को इस यात्रा में निर्णायक बताया।
राष्ट्र प्रेस
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