शिशु सुरक्षा दिवस 7 नवंबर: टीकाकरण और सही पोषण से घटेगी शिशु मृत्यु दर
सारांश
मुख्य बातें
शिशु सुरक्षा दिवस हर वर्ष 7 नवंबर को मनाया जाता है, जिसका मूल उद्देश्य नवजात शिशुओं की देखभाल, समय पर टीकाकरण और संतुलित पोषण के प्रति समाज में जागरूकता फैलाना है। भारत के ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी शिशु स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की गंभीर कमी है, जिसे दूर करना इस दिवस की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
शिशु सुरक्षा दिवस का उद्देश्य और इतिहास
इस दिवस की शुरुआत 1990 के दशक में यूरोपीय देशों द्वारा की गई थी, जिसके बाद से यह वैश्विक स्तर पर मनाया जा रहा है। यह दिन इस विचार पर बल देता है कि शिशुओं की सुरक्षा केवल चिकित्सकों या सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार और पूरे समाज की सामूहिक जवाबदेही है।
इस अवसर पर देशभर में विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम और समारोह आयोजित किए जाते हैं, जिनमें माता-पिता को शिशु जन्म के साथ आने वाली स्वास्थ्य संबंधी जिम्मेदारियों के बारे में शिक्षित किया जाता है।
टीकाकरण और पोषण की भूमिका
विशेषज्ञों के अनुसार, शिशु मृत्यु दर को कम करने में समय पर टीकाकरण, विटामिन 'ए' की खुराक और संतुलित पोषण की निर्णायक भूमिका होती है। इस दिवस पर विशेष रूप से इन तीन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
गौरतलब है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण और टीकाकरण की कमी शिशु मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब भारत में प्रतिवर्ष 2.3 करोड़ से 2.5 करोड़ के बीच बच्चे जन्म लेते हैं।
भारत में शिशु जनसांख्यिकी
2011 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या में 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत से अधिक थी। वहीं, 0 से 14 वर्ष के बच्चे देश की कुल आबादी का 30.76 प्रतिशत हिस्सा थे।
रिपोर्टों के अनुसार, देश में प्रतिदिन लगभग 63,000 से 72,000 शिशु जन्म लेते हैं, जबकि हर घंटे यह संख्या करीब 2,630 से 2,650 के बीच रहती है। इतनी बड़ी जन्म दर को देखते हुए शिशु स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच और गुणवत्ता दोनों अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
आम जनता और परिवारों पर असर
शिशु सुरक्षा दिवस माता-पिता को यह स्मरण कराता है कि नवजात के प्रथम कुछ महीने और वर्ष उसके सम्पूर्ण जीवन की नींव होते हैं। उचित स्तनपान, स्वच्छता, नियमित स्वास्थ्य जाँच और टीकाकरण का अनुपालन न केवल शिशु की जान बचाता है, बल्कि उसकी दीर्घकालिक प्रतिरोधक क्षमता भी सुनिश्चित करता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि जागरूकता अभियानों का प्रभाव तब अधिक होता है जब स्थानीय स्वास्थ्यकर्मी, आँगनवाड़ी कार्यकर्ता और परिवार के बुजुर्ग सदस्य मिलकर नई माताओं का मार्गदर्शन करते हैं।
आगे की राह
शिशु स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए सरकारी योजनाओं और सामुदायिक प्रयासों के बीच समन्वय ज़रूरी है। 7 नवंबर का यह दिन एक अनुस्मारक है कि राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा है, और इस दिशा में प्रत्येक परिवार की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।