चित्तौड़गढ़ का बरोली मंदिर परिसर: 10वीं शताब्दी की नटराज विरासत, पर्यटन और आस्था का संगम

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चित्तौड़गढ़ का बरोली मंदिर परिसर: 10वीं शताब्दी की नटराज विरासत, पर्यटन और आस्था का संगम

सारांश

चित्तौड़गढ़ का बरोली मंदिर परिसर 10वीं शताब्दी की गुर्जर-प्रतिहार स्थापत्य कला का जीवंत प्रमाण है। 9 मंदिरों का यह समूह, जहाँ शिव नटराज रूप में विराजमान हैं, आस्था, इतिहास और पर्यटन का दुर्लभ संगम है — और 1998 में लंदन से बरामद मूर्ति इसकी वैश्विक धरोहर पहचान को और गहरा करती है।

मुख्य बातें

बरोली मंदिर परिसर , चित्तौड़गढ़, राजस्थान में स्थित है और 10वीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार काल में निर्मित हुआ।
परिसर में कुल 9 मंदिर हैं; मुख्य मंदिर घाटेश्वर महादेव (शिव के नटराज स्वरूप) को समर्पित है।
4 मंदिर भगवान शिव को, 2 मंदिर देवी दुर्गा को, और शेष त्रिमूर्ति, विष्णु व गणेश को समर्पित हैं।
वर्ष 1998 में यहाँ से नटराज की पत्थर की मूर्ति चोरी हुई थी, जो बाद में लंदन से बरामद की गई।
घूमने का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च ; परिसर चित्तौड़गढ़ किले और भैंसरोड़गढ़ वन्यजीव अभयारण्य के निकट है।

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित बरोली मंदिर परिसर (जिसे बड़ोली मंदिर भी कहा जाता है) भगवान शिव के नटराज स्वरूप को समर्पित एक अनूठा और ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है, जिसका निर्माण 10वीं शताब्दी में हुआ था। गुर्जर-प्रतिहार काल की स्थापत्य परंपरा की यह उत्कृष्ट कृति न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि अपनी बारीक नक्काशी और प्राचीन इतिहास के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को भी आकर्षित करती है।

मुख्य घटनाक्रम: परिसर की संरचना और विशेषताएँ

बरोली परिसर में कुल 9 मंदिर हैं, जिनका निर्माण तीन अलग-अलग कालखंडों में हुआ। इनमें मुख्य मंदिर घाटेश्वर महादेव को समर्पित है, जहाँ भगवान शिव नटराज रूप में विराजमान हैं। चार मंदिर भगवान शिव को, दो मंदिर देवी दुर्गा को, और शेष मंदिर त्रिमूर्ति, विष्णु, गणेश तथा अन्य देवी-देवताओं को समर्पित हैं।

परिसर के प्रमुख मंदिरों में घाटेश्वर मंदिर, वामनावतार मंदिर, गणेश मंदिर, त्रिमूर्ति मंदिर, अष्टमाता मंदिर और शेषशयन मंदिर शामिल हैं। ऊँचे शिखर, नक्काशीदार खंभे और देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं तथा रोज़मर्रा के जीवन को उकेरती जटिल मूर्तियाँ इस परिसर को स्थापत्य कला का अनमोल नमूना बनाती हैं।

ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक धरोहर

गुर्जर-प्रतिहार काल में निर्मित यह परिसर राजस्थान की मंदिर स्थापत्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह ऐसे समय में आया है जब देश में प्राचीन धरोहरों के संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। गौरतलब है कि वर्ष 1998 में बरोली मंदिर से भगवान नटराज की एक दुर्लभ पत्थर की मूर्ति चोरी हो गई थी, जो बाद में लंदन से बरामद की गई — यह घटना भारत की सांस्कृतिक धरोहर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान और उसकी सुरक्षा की चुनौती दोनों को रेखांकित करती है।

परिसर में प्रवेश करते ही प्राचीन काल की दिव्य ऊर्जा और शांति का अनुभव होता है। पत्थर की दीवारों पर पड़ती रोशनी और परछाइयों का अनूठा खेल फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए विशेष आकर्षण है।

पर्यटन स्थल के रूप में उभरती पहचान

बरोली मंदिर परिसर अब केवल तीर्थस्थल नहीं, बल्कि एक विकसित होते पर्यटन केंद्र के रूप में भी अपनी जगह बना रहा है। यह परिसर चित्तौड़गढ़ किले, मीरा मंदिर और भैंसरोड़गढ़ वन्यजीव अभयारण्य के निकट स्थित है, जिससे पर्यटक एक ही यात्रा में इतिहास, आस्था और प्रकृति का एकसाथ अनुभव कर सकते हैं।

यहाँ आने वाले पर्यटक प्राचीन वास्तुकला, शिल्पकला और शांत वातावरण का आनंद लेते हैं। मंत्रोच्चार की ध्वनि और परिसर की सुगंध वातावरण को और अधिक पवित्र बना देती है।

यात्रा का सही समय और व्यावहारिक जानकारी

बरोली मंदिर घूमने का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च तक है, जब मौसम सुहावना रहता है। अप्रैल से जून के बीच यहाँ कड़ी गर्मी पड़ती है, इसलिए इस अवधि में यात्रा से बचना उचित रहता है। राजस्थान के अन्य प्रमुख पर्यटन स्थलों के साथ इसे जोड़कर यात्रा की योजना बनाई जा सकती है।

आने वाले समय में यदि इस परिसर के संरक्षण और पर्यटन अवसंरचना पर ध्यान दिया जाए, तो बरोली राजस्थान के प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट में और मज़बूती से स्थापित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा की भी है — 1998 में लंदन से मूर्ति की वापसी इस बात की याद दिलाती है कि अंतरराष्ट्रीय कला-तस्करी के सामने हमारे प्राचीन स्थल कितने असुरक्षित हैं। गुर्जर-प्रतिहार काल की इस उत्कृष्ट कृति को मुख्यधारा की मीडिया जितनी जगह देती है, उससे कहीं अधिक यह परिसर संरक्षण और पर्यटन नीति की दृष्टि से ध्यान माँगता है। राजस्थान में पर्यटन का विस्तार हो रहा है, लेकिन जयपुर-जोधपुर-उदयपुर के बाहर के स्थलों को उचित अवसंरचना और प्रचार मिले बिना यह विरासत उपेक्षित रहने का जोखिम उठाती है।
RashtraPress
15 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बरोली मंदिर परिसर कहाँ स्थित है और यह किसे समर्पित है?
बरोली मंदिर परिसर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है और मुख्य रूप से भगवान शिव के नटराज स्वरूप को समर्पित है। इसका मुख्य मंदिर घाटेश्वर महादेव कहलाता है।
बरोली मंदिर का निर्माण कब और किस काल में हुआ?
इस परिसर का निर्माण 10वीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार काल में हुआ था। परिसर के 9 मंदिर तीन अलग-अलग कालखंडों में बने हैं।
बरोली मंदिर से 1998 में क्या हुआ था?
वर्ष 1998 में बरोली मंदिर से भगवान नटराज की एक दुर्लभ पत्थर की मूर्ति चोरी हो गई थी। यह मूर्ति बाद में लंदन से बरामद की गई, जो अंतरराष्ट्रीय कला-तस्करी की एक उल्लेखनीय घटना मानी जाती है।
बरोली मंदिर घूमने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
अक्टूबर से मार्च का समय बरोली मंदिर भ्रमण के लिए सर्वोत्तम है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना रहता है। अप्रैल से जून के बीच कड़ी गर्मी के कारण यात्रा असुविधाजनक हो सकती है।
बरोली मंदिर के आस-पास और कौन से दर्शनीय स्थल हैं?
बरोली मंदिर परिसर चित्तौड़गढ़ किले, मीरा मंदिर और भैंसरोड़गढ़ वन्यजीव अभयारण्य के निकट स्थित है। पर्यटक एक ही यात्रा में इतिहास, धार्मिक आस्था और प्रकृति तीनों का अनुभव कर सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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