आईटी कर्मचारी शोषण पर पवनजीत माने की माँग: महाराष्ट्र में कंपनियों में अनिवार्य कर्मचारी समिति बने
सारांश
मुख्य बातें
आईटी एम्प्लॉइज फोरम के अध्यक्ष पवनजीत माने ने 15 जून 2025 को पुणे में महाराष्ट्र सरकार से माँग की कि राज्य की आईटी कंपनियों में अनिवार्य कर्मचारी समिति (मैंडेटरी इम्प्लॉई कमेटी) गठित की जाए, ताकि कर्मचारी बिना भय के अपनी शिकायतें दर्ज करा सकें। उन्होंने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (TCS) सहित बड़ी आईटी कंपनियों पर कथित तौर पर जबरन इस्तीफा दिलाने, उचित मुआवज़ा न देने और शिकायतों को दबाने के गंभीर आरोप लगाए।
मुख्य आरोप और माँगें
माने के अनुसार, आईटी सेक्टर में कर्मचारियों की स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि वे अपनी बात कहीं रख नहीं पा रहे। उन्होंने बताया कि बढ़ते मानसिक दबाव के चलते हाल ही में एक और आत्महत्या का मामला सामने आया है। माने का कहना है कि जो कर्मचारी श्रम विभाग का दरवाज़ा खटखटाने की कोशिश करते हैं, उन्हें कंपनी से निकाले जाने की धमकी दी जाती है।
उनकी माँग है कि जब भी कोई सरकारी जाँच टीम या समिति किसी कंपनी का दौरा करे, तो कर्मचारियों से एक-एक करके और अलग-अलग मिला जाए — ताकि सामूहिक दबाव में कोई चुप न रहे।
TCS नासिक मामला: जाँच टीम को 'कुछ न बताने' की धमकी
माने ने TCS नासिक के एक विशेष मामले का ज़िक्र किया। उनके अनुसार, सरकार द्वारा गठित एक समिति जब कंपनी के दौरे पर आई, तो कुछ कर्मचारियों ने फोरम को बताया कि HR विभाग ने उन्हें धमकी दी कि जाँच टीम को कुछ भी न बताएँ, सोशल मीडिया पर नासिक TCS से जुड़ी कोई बात न करें, और कंपनी की आंतरिक नीतियों या उत्पीड़न के बारे में बाहर कुछ न कहें। ये आरोप कर्मचारियों के बयानों पर आधारित हैं और स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुए हैं।
सरकार के सामने पहले भी उठा चुका है मुद्दा
माने ने बताया कि पिछले महीने श्रम मंत्री और श्रम आयुक्त के समक्ष आईटी कंपनियों में कर्मचारी शोषण का मुद्दा औपचारिक रूप से उठाया जा चुका है। हाल ही में एक महिला कर्मचारी भी फोरम के पास अपनी समस्याएँ लेकर आई, जो इस मुद्दे की व्यापकता को दर्शाता है।
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में आईटी सेक्टर में छँटनी और कार्यस्थल दबाव को लेकर बहस तेज़ हो रही है। गौरतलब है कि TCS जैसी कंपनियाँ देश के सबसे बड़े निजी नियोक्ताओं में शामिल हैं।
आगे क्या होगा
माने ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने अनिवार्य कर्मचारी समिति के गठन पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो फोरम आंदोलन की राह अपना सकता है। उनका कहना है कि कंपनियों का स्तर इस कदर गिर चुका है कि सरकारी हस्तक्षेप अब अपरिहार्य हो गया है।